शनिवार, जुलाई 31, 2010

बड़ा धक्का है..

( इंदौर के भाई रफ़ी मोहम्मद शेख ने भी दुबेजी से जुडी कुछ बातें हमसे साझा की हैं. 
कल शाम को विकास संवाद में एक सभा आयोजित कर दुबे जी को याद  किया और उन्हें विनम्र श्रधांजलि दी गयी.  )




दुबेजी के जाने का समाचार सबके लिए तो धक्का है लेकिन मेरे लिए भी बड़ा धक्का है.. जिंदगी में कुछ लोग ऐसे होते है जो कुछ ही पल साथ रहते है लेकिन दिल में जिंदगीभर के लिए साथ हो जाते है.. दुबेजी ऐसे ही लोगो में से थे.. मेरी और उनकी मुलाकात व साथ २ दिनों की ही लेकिन सम्बन्ध ऐसे बन गए कि जैसे सालों  से हो..
महेश्वर में आयोजित प्रोग्राम के लिए जब मै इंदौर से निकलने वाला था राकेशभाई का कॉल आया कि दिल्ली से कुछ साथी आ रहे है आप उनके साथ आ जाना.. उनमे एक दुबेजी काफी सीनियर है.. मैंने तुरंत प्रतिप्रश्न किया कि कहा फंसवा रहे हो मुझे उनके साथ.. उनका जवाब था काफी अच्छे है वो.. आप एडजस्ट हो जाओगे.. मैं आपको उनका और उन्हें आपका नम्बर दे रहा हूँ.. थोड़ी देर बाद ही पशुपति भाई  और दुबेजी से मोबाइल पर चर्चा हुई..
रेलवे स्टेशन पर जैसे ही पहली बार हमारी मुलाकात हुई वैसे ही लगा कि पशुपति भाई और दुबेजी से पट जाएगी..
उसके बाद मुलाक़ात का दौर शुरू हुआ..कहाँ हो .. क्या करते हो.. जैसे प्रश्नों से लेकर मानसिकता तक के प्रश्न दुबेजी ने अपने अंदाज़ में दागे और उत्तर जाने.. मैं भी उनके बारे में जानने के लिए उत्सुक था.. और जाना भी..  ख़ास बात यह बताना चाहता हूँ कि न केवल उत्तर बल्कि उन प्रश्नों के उत्तर जानने के बाद उन्होंने सही गलत को सही तरह से समझाया भी.. मेरे साथ-साथ इंदौर के बारे में भी वह जानना चाहते थे और पहले से जितना जानते थे.. उसका क्रास चेक भी करते जा रहे थे.. बहुत सी चीजों में उनकी मैंने अपडेट किया तो बहुत बातो में उन्होंने भी मुझे अपडेट किया.. 110 किलोमीटर के रास्ते में उनसे स्नेह का नया रिश्ता बना.. महेश्वर पहुँचने के बाद जब गाँवों में जाने के लिए अलग-अलग ग्रुप बनाये गए तो मै और दुबेजी दोनों एक ही ग्रुप चाहते थे.. लेकिन पहले से निश्चित ग्रुप के कारण एक साथ नहीं हो पाए.. तो उन्होंने और मैंने दोनों से राकेशभाई से एक ही ग्रुप में रखने का आग्रह किया.. जो अस्वीकार हो गया.. महेश्वर डेम और उसके बाद रात को लौटने के बाद तक उन्हें और मुझे इस बात का अफ़सोस रहा..
खैर रात को गाँव से मै पहले आ गया था और फिर होटल भी चला गया.. मै रूम में अकेला था और दुबेजी या पशुपतिजी का साथ चाहता था.. पशुपतिजी अपने दोस्तों के साथ ही गेस्ट हाउस में ही रुक गए थे... दुबेजी से बात नहीं हो पायी.. रात को १२.३० बजे मेरे रूम का दरवाजा किसी ने खटखटाया.. मैंने उन्हें कह दिया यहाँ पर तो कोई और भी है.. वो आ रहे है.. तब तक दुबेजी के आने की सुचना नहीं थी और ना बात हुयी थी... लेकिन थोड़ी देर बाद फिर से किसी ने आवाज़ लगायी.. दरवाजा खोला तो दुबेजी थे.. मै और वो दोनों प्रसन्न थे कि एक साथ रहेंगे.. उन्होंने अपने लिए जगह रोकने के लिए मुझे काफी दुआए भी दी.. रात में देर तक उनसे कई मुद्दों पर चर्चा हुयी.. Discovery से लेकर धर्म-परिवार तक पर उनके विचार लोगो से अलग थे और ख़ास बात उनका ज्ञान और अपनी बात पर सही व सटीक विश्लेषण के साथ के दमदार उदाहरण... मुझे उन्होंने काफी प्रेरित किया... बार बार कहा कि यंग जर्नालिस्ट  के साथ ही यंग लेकिन सुलझी हुयी अनुभवी सोच भी है तुममे.. सुबह नाश्ते के समय एक महाशय से उनकी मुग़ल इतिहास पर काफी लम्बी बहस भी हुई.. और उन्हें मानना पड़ा कि दुबे के तर्क सही है.. मुझे भी उन्होंने कई बार इस बहस में शामिल किया..
महेश्वर से अचानक आ जाने के बाद उनसे मुलाकात नहीं हो पायी.. हां आते समय जरुर उनसे मुलाक़ात करना नहीं भूला  था.. इसके बाद एक दिन दिल्ली से उनका फ़ोन आया.. करीब ३० मिनट तक बात हुई.. काफी बाते समझाई और टिप्स भी दिए.. वो कुछ लेख भी मुझे प्रिंट के लिए भेजने वाले थे.. ख़ास बात यह रही कि उन्होंने मेरी न्यूज़ नेट पर देखी और उस बारे भी वो मुझे दाद देने में नहीं चुके.. एक बार और उनसे बात हुई.. और अब उनके जाने का समाचार सुना..

दुबेजी जैसे इंसान से जो सिखने को मिला वो हमेशा प्रेरणा रहेंगा.. मेरी दिल से श्रधांजलि और नमन..
रफ़ी मोहम्मद शेख

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