मंगलवार, जनवरी 12, 2010

नौ बरस की उम्र में 60 बार चढ़ा खून

उज्जैन। नौ साल का सुमित आठ वर्षो से पराए खून पर जिंदा है। कुदरत के कहर के सताए इस मासूम को अभी तक 60 बार खून चढ़ाया जा चुका है। थैलेसीमिया पीडित बच्चे का इलाज कराने में परिवार कर्ज तले डूब गया है और अब पिता की हिम्मत भी जवाब दे चुकी है। इस बीमारी वाले बच्चों के शरीर में खून नहीं बनता और उसे दूसरों का खून देकर ही जीवित रखा जा सकता है। मेडिकल साइंस में भी इस बीमारी का प्रभावी इलाज नहीं है। लिहाजा गरीब पिता यहां-वहां मदद की गुहार लगाकर बच्चे का इलाज करवा रहा है।

महाकाल रोड स्थित किराए के छोटे से मकान में रहने वाले राजू राव का नौ वर्षीय पुत्र सुमित जब एक वर्ष का था, तब रक्त की जांच के दौरान उसे पता चला कि बेटे को थैलेसीमिया है। फ्रीगंज स्थित किराने की दुकान में काम करने वाला राजू तीन हजार रूपये महीना कमाता है जिसमें उसे पत्नी सहित चार बच्चों का भरण-पोषण करना पड़ता है। ऎसे में आठ साल से वह बेटे की जिंदा रखने के लिए खून की व्यवस्था कर रहा है। इसके लिए कई बार ब्याज पर पैसे लेना पडे। कर्ज लेकर सुमित का इलाज करवाकर थक चुके गरीब पिता ने कई बार जिम्मेदार अघिकारियों व जनप्रतिनिघियों से गुहार लगाई लेकिन उसकी फरियाद पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। मौत से लड़ रहे बच्चे का उसने सितंबर में इंदौर के एमवाय हास्पिटल में ऑपरेशन भी करवाया था जिसमें उसे पंद्रह टांके लगे थे।

दूसरे बच्चों की पढ़ाई छूटी
राजू राव के चार बच्चों में सुमित तीसरे नंबर का है। इलाज खर्च इतना हो जाता है कि वह दो पुत्रों विक्की और नवीन को पढ़ाई भी नही करवा पा रहा। कार्तिक चौक के निजी विद्यालय में पढ़ने वाले दोनों बच्चों को फीस जमा नहीं होने के कारण स्कूल से निकाल दिया गया है। पिता मजबूर हैं करे तो क्या करें।

घर चलाएं या इलाज कराएं
सुमित की मां विद्या राव ने को भी बच्चे के इलाज के लिए सहायता की आस है। पति की कमाई घर में ही खर्च हो जाने से बीमार बच्चे का इलाज कराना भी मुश्किल है। इलाज के पैसे नहीं होने से कर्ज में डूबे परिवार के सामने दूसरे बच्चों के भविष्य की चिंता भी सताती है।

जन्मजात बीमारी
यह बीमारी जन्मजात होती है। वैसे तो यह लाइलाज है लेकिन इसमें रक्त देने के साथ-साथ पीडित का मनोबल बढ़ाने की जरूरत होती है। इस प्रकार की बीमारी हजारों में किसी एक को होती है।
-डॉ. पीएम कुमावत, वरिष्ठ चिकित्सक जिला अस्पताल

ऎसी जिंदगी से तो मरना अच्छा
बेटे का इलाज कराते-कराते परेशान हो चुके राजू राव का कहना है कि ऎसी जिंदगी से तो मैं मरना अच्छा समझता हूं। जब से इस बीमारी का पता चला है तब से मेरी जिंदगी का चैन छिन गया है। जैसे-तैसे तो परिवार पाल रहा हूं, इलाज के रूपए कहां से लाऊं। हर एक-दो माह में खून चढ़ाना पड़ता है। मुश्किल रक्तदाता मिल पाता है।
सौजन्य - पत्रिका

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