शनिवार, दिसंबर 19, 2009

सबको शिक्षा समान शिक्षा

  आजादी के छह दशक बीत जाने के बाद भी प्रदेश में शिक्षा की हालत बदहाल है। भारतीय संविधान द्वारा बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार के बावजूद प्रदेश के सभी बच्चों को यह बुनियादी हक नहीं मिल पाया है। शिक्षा विभाग के आंकड़े ही बताते हैं कि 2006-07 तक 5 से 14 साल के लगभग तीन लाख बच्चे स्कूल से बाहर थे। इससे भी बड़ा सवाल तो यह है कि जितने बच्चों को स्कूल नसीब हुए हैं, उनकी स्थिति कैसी है। शिक्षा के व्यावसायीकरण ने एक ओर तो फाइव स्टार सुविधा वाले विशाल स्कूल खड़े कर दिए हैं, दूसरी तरफ शिक्षा के सरकारी ढांचे को कमजोर किया जा रहा है। एक तरफ तो आधुनिक तकनीक और तमाम साधनों से लैस स्कूल हैं दूसरी तरफ पैरा शिक्षकों के भरोसे चलने वाले स्कूल, जिनमें बुनियादी सुविधाएं तक मौजूद नहीं हैं। इससे समाज में एक गहरी खाई बनती जा रही है। पर बड़ा सवाल यह है कि इस पूरे ढांचे में व्यापक बदलाव के बिना सबके लिए समान शिक्षा की अवधारणा को कैसे लाया जा सकता है।
मप्र में 81, 529 सरकारी प्राथमिक विद्यालय हैं, जबकि लगभग 17,000 गैर सरकारी प्राथमिक शालाएं मौजूद हैं। इसी तरह 25 हजार 884 शासकीय अपर प्राथमिक स्कूल हैं, इसी स्तर के लगभग 12 हजार गैर सरकारी स्कूल प्रदेश में संचालित किए जा रहे हैं। इसका मतलब यह है कि प्रदेश में गैर सरकारी स्कूलों का विस्तार तेजी से हुआ है। गैर सरकारी स्कूल की मोटी फीस चुकाना प्रदेश की बढ़ी आबादी के बूते के बाहर की बात है। जिस प्रदेश की 17 प्रतिशत प्राथमिक और 7.7 प्रतिशत शालाएं एक शिक्षको के भरोसे चल रही हो, वहां शिक्षा की गुणवत्ता को समझा जा सकता है। आधारभूत संसाधनों के अलावा गुणात्मक शिक्षा में शिक्षको की भूमिका बेहद अहम होती है, लेकिन प्रदेश के में तमाम तरह के स्कूल और उनके समानांतर कई तरह के शिक्षक खड़े कर दिए गए हैं। संविदा शिक्षक, गुरूजी, अध्यापक, जैसे शीर्षकों के साथ केवल औपचारिक अंदाज में शिक्षको की नियुक्ति की गई है, लेकिन सच्चाई यह है कि इनमें प्रशिचित 53 प्रतिशित शिक्षक ही प्रशिछित हैं। प्रदेश की सरकारी शालाओं में नियुक्त 47 प्रतिषत शिक्षको को प्रषिक्षण की जरूरत है। यही कारण है गुणवत्ता के मामले में सरकारी स्कूल कमजोर हुए हैं और मध्यमवर्गीय परिवारों की एक बड़ी आबादी का गैर सरकारी स्कूलों की तरफ रूझान तेजी से बढ़ रहा है। तब सवाल यह है कि क्या सरकारी स्कूलों में मजबूर और आर्थिक रूप से अक्षम परिवार के बच्चे ही पढ़ सकेंगे। सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से करोड़ों रूपए खर्च कर पिछले दशक में सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलने की कोशिश की गई, पर शिक्षा की गुणवत्ता की बजाए इमारतें खड़ी करने पर अधिक जोर दिया गया। यदि ऐसा किया गया होता तो क्या स्कूल छोड़ने वाले बच्चों का प्रतिशत 2000-01 में दस प्रतिशत से 2006-07 आते-आते दोगुना हो गया होता। क्या यह आंकड़ा सरकारी स्कूलों की दुर्दशा बताने के लिए काफी नहीं है कि विदिशा जिले की नटेरन तहसील के 282 स्कूलों का एक भी बच्चा प्राथमिक स्तर की परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाया।
इसके अलावा हमें यह भी देखना होगा कि प्राथमिक स्तर पर शिक्षक -शिक्षार्थी का अनुपात कितना है जो कि एक महत्वपूर्ण कारक हैं। स्कूल के मापदण्ड़ एवं मानक कहते हैं कि प्राथमिक स्तर पर प्रति 30 बच्चों पर एक तथा माध्यमिक स्तर पर प्रति 35 बच्चों पर एक शिक्षक की अनिवार्यता होना ही चाहिये परन्तु वर्तमान में प्रदेश में प्राथमिक स्तर पर प्रति 48 तथा माध्यमिक स्तर पर प्रति 36.8 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक की उपलब्धता है। अतएव प्राथमिक स्तर पर यह अनुपात 18 की संख्या में अधिक है यानि ५० प्रतिशत से ज्यादा, जबकि प्राथमिक स्तर ही बच्चों को व्यक्तिगत् रूप से ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।
इसके अलावा प्रदेष की 52.52 प्रतिशत यानी 12,760 माध्यमिक शालाओं के पास अपना स्वयं का भवन नहीं है तथा प्रदेश की 2.70 प्रतिशत यानि 2197 प्राथमिक शालाओं के पास अपना स्वयं का भवन नहीं है।
महाविद्यालयो में प्रवेश दर में बीस प्रतिशत की गिरावट विकास की सूचक है या पीछे जाने की। प्रदेश में ढाई लाख बच्चे आवासीय ब्रिज कोर्स और ऐसी दूसरी वैकल्पिक योजनाओं के माध्यम से शालाओं में दर्ज हैं, लेकिन सच यह है कि इनके माध्यम से कागजों में आंकड़ों को मजबूत किया जा रहा है। जमीनी सच्चाई यह है कि इस तरह के स्कूलों में षिक्षा का स्तर बहुत ही कमजोर है। षिक्षा की गुणवतता से आषय यी नहीं कि षिक्षक महज रोचक तरीके से षिक्षण करे अपितु शाला भवन, पुस्तकालय और खेल का मैदान, षिक्षकों का प्रषिक्षण, बैठने के लिये पर्याप्त जगह, षिक्षक विद्यार्थी अनुपात, पर्याप्त शौचालय (बालक-बालिका के लिये पृथक-पृथक) आदि व कुछ और बातें यथा षिक्षकों का व्यवहार व सामाजिक समरसता में कमी आदि ऐसी बाते हैं जो कि गुणवत्ता पूर्ण षिक्षण में कमी के प्रमुख कारक हैं। सर्वषिक्षा अभियान व ऐसी कई समानांतर संरचनाओं का ढिंढ़ौरा तो खूब पीटा गया परन्तु पहल में अभी भी कमी बाकी है।
आज प्रदेष की प्राथमिक व माध्यमिक स्तर की क्रमशः 48900 (60.12:) तथा 15413 (63.44:) शालाओं में खेल का मैदान नहीं है। प्रदेश की 24.63 प्रतिशत प्राथ. शालाओं तथा 63.44 प्रतिशत माध्य. शालाओं में पेयजल की अनुपलब्धता है। प्रदेश की 47.98 प्रतिशत प्राथ. शालाओं तथा 59.20 प्रतिशत माध्य. शालाओं में शौचालयों की अनुपलब्धता है। प्राथमिक व माध्यमिक स्तर की क्रमशः 56866 (69.91:) तथा 15413 (63.44:) शालाओं में बालिकाओं के लिये पृथक से शौचालय की व्यवस्था नहीं है।
केवल सरकार से ही नहीं सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में समाज का एक तबका अपने अधिकार के लिए महरूम है। प्रदेश में आदिवासी तबके की साक्षरता दर अब भी राष्टीय दर से छह प्रतिषत पीछे है। दलित और आदिवासी तबके के बच्चों के साथ स्कूलों में भेदभाव का मुद्दा कोई नया नहीं है। मध्याहन भोजन योजना के बाद तो इसके प्रभावों को और नजदीक से देखा जाने लगा है। भोपाल में एक जनसुनवाई के दौरान देवास जिले के सोनकच्छ तहसील के एक दलित बच्चे ने कहा था कि स्कूल में शिक्षको के द्वारा भेदभाव किया जाता है, और उसे मध्याहन भोजन योजना की रोटी दूर से फेंक कर दी जाती है। सागर जिले में भी एक बेहद मार्मिक घटना सामने आई थी जब खजूरिया गांव की ग्यारह साल की छात्रा प्रेमलता को एक सवाल का गलत जवाब देने पर इतनी बुरी तरह से पीटा गया था कि उसकी 1 नवम्बर को मौत हो गई। एक मामला और सामने आया था जब केजी टू में पढ़ने वाले अमोल कुशवाहा को अंग्रेजी की स्पेलिंग गलत लिखने की वजह से पीटा गया था। नेशनल चार्टर फॉर 2003 कहता है कि स्कूल में अनुशाशन या इससे संबंधित किसी भी घटना के परिणाम में बच्चों को इस तरह का दंड नहीं दिया जाना चाहिए जिसके परिणामस्वरूप उन्हें किसी तरह की शारीरिक या मानसिक क्षति पहुंचे। तमाम शोध बताते हैं कि खेल-खेल और हलके माहौल में क्षा एक बेहतर मॉडल है। बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए गठित नेशनल कमीशन ने 26 मई 2009 को बच्चों की सुरक्षा के लिए चेताया था, लेकिन इसके बावजूद मध्यप्रदेष सरकार और संबंधित विभाग ने इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया। केवल जातिगत आधारों पर ही नहीं, आर्थिक आधारों पर भी स्कूल षिक्षा साफतौर पर कई भागों में बंटी नजर आ रही है। हर तबके के लिए अलग स्कूल हैं। महंगे स्कूल, महंगी षिक्षा स्टेटस सिंबल बनती जा रही है, लेकिन मप्र के उन 67 लाख बीपीएल परिवारों का क्या जिनके बच्चे सरकारी स्कूल की किताबों का जुगाड़ ही बड़ी मुश्किल से कर पाते हैं। क्या इस तरह के ढांचों में सबके लिए समान षिक्षा का हक संभव है।
नतीजों पर नजर - 2006-07 में कक्षा पांच और कक्षा आठ के नतीजों का विश्लेषण करें तो कक्षा पांच में 81.5 और कक्षा आठ में 71.5 प्रतिषत विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए थे। कक्षा आठ का प्रतिशत पांच की तुलना में दस प्रतिशत तक घट गया था। कक्षा पांच में जहां 22.5 प्रतिशत बच्चों ने ए ग्रेड हासिल की वहीं आठवी में 17.3 प्रतिशत बच्चे यह हासिल कर सके। यानी जैसे-जैसे छात्र उच्च कक्षाओं की ओर बढ़े प्रतिशत के साथ ही गुणवत्ता के मामले में पीछे नजर आए।

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