मंगलवार, अप्रैल 23, 2019

आज चर्चा नेहरू सत्य और मिथक की




चूंकि आज ​विश्व पुस्तक दिवस है, और भले ही अपन खूब पढ़ा​—लिखी नहीं भी कर पाते हों पर किताबों से लगाव तो बना ही हुआ है, इसलिए बार—बार उनके पास जाने को मन करता है, और तब जबकि किताबें केवल अपने ज्ञान का स्तर बढ़ाए जाने के लालच से बढ़कर समाज की घटनाओं—परिघटनाओं के संदर्भ में एक अनिवार्य जरूरत बन जाए, इस स्थिति में अपने ही एक मित्र की किताब का बखान करना प्रायोजित माना जा सकता है, किंतु अपने प्रकाशन के महज तीन महीनों में एक हजार संस्करण, फिर हजार संस्करण और फिर पांच हजार संस्करणों का प्रिंट आर्डर अपने आप में उस दस साल की धैर्यपूर्ण लिखापढ़ी की स्थापना कर देता है।

मैं अपने अभिन्न मित्र पीयूष बबेले की ही पहली लेकिन धमाकेदार और जरूरी किताब नेहरू सत्य और मिथक का जिक्र कर रहा हूं जिसमें वह गांधी के सत्य के मूल्य को बचाने के लिए उस असत्य पर सीधे—सीधे हमला बोल रहे हैं जिसके इस दौर में सबसे बड़े शिकार नेहरू हुए हैं, इसलिए मैं कहता हूं कि यह इस दौर की महत्वपूर्ण किताब है, इसलिए कि यह मिथकों को तोड़कर सच को सामने लाती है, और मैं बहुत खुले मन से यह चुनौती देता हूं कि यदि इसमें एक भी बात अप्रमाणिक और आधारहीन है तो उसका उसी तरह जवाब दिया जाना चाहिए, जिस तरह पीयूष उसे पेश करते हैं। 

मैं कहता हूं कि नेहरू युग की इससे बेहतर, इससे सरल, इससे सुबोध किताब हो नहीं हो नहीं सकती। केवल तथ्यों के प्रस्तुतिकरण पर ही नहीं इसके शिल्प की जो भी रचना पीयूष बबेले ने की है, उससे न केवल इतिहास में हमारी रुचि बनी रहती है, जिसे अक्सर सामान्य पाठक वर्ग अरुचिकर ही मानता रहा है, बल्कि वह ऐसे समय में हमारे सामने आती है, जिस वक्त तमाम संचार माध्यमों से किसी का चेहरा भी बहुत आसानी से बदरंग भी किया जा सकता है और बहुरंग भी। इसलिए इस आभासी मायावी संसार में केवल अपने तर्कों के सहारे ठीक सही जगह खड़े हो सकते हैं, और तर्कों के लिए सही, प्रामाणिक और ठोस तथ्य आपके हाथ में होने चाहिए।

किताब के कवर पेज पर एक फलैप की तरह इतिहास जरूर लिख दिया गया है, पर वास्तव में यह इतिहास भर तो नहीं है। और फिर यह नेहरू के आधुनिक भारत के निर्माण पर एक विहंगम दृष्टि भी है। इसलिए भी यह नेहरू युग होकर भी नेहरू युग ही तो नहीं है। यह केवल नेहरू भी नहीं है, इसमें गांधी की बात भी है, इसमें सरदार भी आते हैं, इसमें भगतसिंह भी चले आते हैं, ओर इसमें गोलवलकर भी हैं। इनके आए बिना इतिहास कहां बन सकता है, इसलिए यह विहंगम दृष्टि के साथ—साथ समग्र दृष्टि से देखकर लिखी गई किताब है। यह किताब एक तरह का संदर्भ ग्रंथ है, और इसे आप जरूरत के हिसाब से अध्यायों में बांटकर अपनी सुविधा से भी पढ़ सकते हैं। यह आपके ज्ञान को बढ़ाती भी है और चौकाती भी है। इसमें लेखक खुद भी चले आते हैं और अपने स्कूल के अनुभव और नेहरू की मूर्ति के नीचे लग रही शाखा के बारे में भी जिक्र करते हैं, ऐसे यह एक दिलचस्प इतिहास से रूबरू कराती हैं। मेरी अपेक्षा थी कि इस किताब में वह आरक्षण पर भी एकाध अध्याय करते, बस एक उसी जरूरी विषय की कमी खली। बाकी यदि आप खुद के लिए इस साल कुछ लिखना—पढ़ना चाहते हैं, तो मुझे लगता है यह किताब जरूर ही पढ़ें।

और इधर आज विश्व पुस्तक दिवस के दिन ही गुरूजी पीपी सिंह ने गांधी पर प्रकाशित स्मारिका दफ्तर में​ भिजवा दी। इस किताब की योजना की शुरूआती योजनाओं में सर ने मुझे शामिल रखा, इसके लिए मैं सर का आभारी हूं। आज इस किताब को देखा तो लगा कि गांधी 150 के संदर्भ में बहुत उम्दा काम हो गया है। यह गंभीर काम भी पब्लिक रिलेशंस सोयायटी की ओर से किया गया, जिसे केवल हम जनसंपर्क संस्था के रूप में जानते रहे हों, उसका भोपाल चैप्टर कैसे एक बेहतरीन नेतृत्व में आगे बढ़ता है उसकी मिसाल बनकर आई है किताब देश समाज और गांधी। देश के चालीस शीर्ष लेखकों के विचारों का ऐसा संकलन तो कोई गांधीवादी संस्था भी नहीं कर पाई। इसके पीछे की भावना भी आपको किताब के सबसे पीछे के लेख्र में मिलेगी जिसमें संपादक अपनी बात कह रहा है बाकी लेखकों को फिलहाल नहीं पढ़ पाया हूं।

भोपाल से निकलने वाली दो अद्भुत पत्रिकाएं साइकिल और प्लूटो को खुद भी पढ़ें, अपने मोहल्ले के बच्चों को जरूर पढ़ाएं। बाल साहित्य के लिए बहुत उम्दा काम किया जा रहा है। यह चकमक की चमक का विस्तार है, जो आपको खुबसूरत किंतु तार्किक संसार में ले जाता है। बहुत इंतजार के बाद इस बार मेरी एक कहानी प्लूटो के अंक में छपी है। इसके पारिश्रमिक के लिए फोन आया तो मैंने उसकी जगह दोनों पत्रिकाओं का सालभर की सदस्यता का निवेदन कर लिया, जो स्वीकृत भी हो गया।

दो दिन पहले एक व्याख्यान सुनने सप्रे संग्रहालय गया था। किताबों से खचाखच भरी अलमारियों के बीच वह सभागार सचमुच विचारों के लिए सबसे मुफीद जगह लगा। एक अलमारी से चांद पत्रिका की प्रतियां झांककर मुझे देख रही थीं, यह वही पत्रिका थी जिसका किस्सा राजेश बादल कुछ दिन पहले सुना रहे थे। इस संग्रहालय में आकर आपका अहंकार टूटता है कि कितना कुछ है जो छूने के लिए बाकी है। 

समय कम है और बहुत कुछ किया, सुना, बोला जाना शेष है सचमुच।

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