बुधवार, मार्च 05, 2014

कुदरत के रंग और ऋतुओं की नूरा कुश्ती

कहते हैं रायपुर में दो ही मौसम होते हैं, गर्मी और बहुत गर्मी। पर यह क्या, मार्च का महीना है। खूंटी पर टंगे कैलेंडर से इस महीने की चार तारीखें इतिहास भी बन गईं, आज पांचवा दिन है और यह मौसम। गर्मी और सर्दी की इस नूराकुश्ती ने कल शाम से ही रायपुर का अखाड़ा तैयार कर लिया था। पर हां, यह भारत—पाकिस्तान का मैच नहीं था जो बॉल टू बॉल रोमांचक होता चला जाए। यह हर फरवरी के बाद का वही महीना है जिसका मिजाज यहां सालों से गरम ही रहा है।
सालों से इस महीने की हुकूमत पर राज करते आ रही गर्मी को धरतीपटक करने के लिए सर्दी ने कल शाम से ही ताल ठोंकना शुरू कर दिया था। इस बात का अंदाजा तो गरम मिजाज शहर को जरूर था, लेकिन सर्दी जीत जाने के लिए इतनी आतुर होगी, यह अंदाजा कतई नहीं था। आलम यह हुआ कि सालों बाद अपने घरों की छतों पर टंगे पंखे मार्च के महीने में आराम से घर वालों के साथ सोते पाए गए। सुकून की नींद के बाद सुबह—सुबह लोगों ने आंखें खोली तो फिजा कुछ अलग थी। सालों बाद रायपुर की सुबह कोहरे की चादर लपेटकर सर्दी में कंपकंपा रही थी। रायपुर स्टेशन की घड़ी 7 बजकर 10 मिनट बता रही थी। हमारे फोटोजर्नलिस्ट का कैमरा जूम करने के बावजूद इसे बमुश्किल पकड़ सका। कोहरे की रफ्तार ने रेल की पांत पर भी अपना असर बिखेर रखा था। रात भर की थकान से अलसाए रेलगाडिय़ों की ड्राइवरों के लिए आज ज्यादा चौंकन्ना रहने का समय था। उन मुसाफिरों के लिए चौंकने का जो रायपुर की फिजा को जानते हैं। उनके लिए तो यह सुबह मुश्किल भरी ही साबित हुई जो गरम कपड़े इस निश्चिंतता में अपने घरों को ही छोड़ आए कि रायपुर में सर्दी थोड़ी ही होती है। पूरा शहर, पूरे शहर में सुबह की चाय के साथ एक ही चर्चा कोहरा। घड़ी चौक कैमरे में मुश्किल से दिख सका। बूढ़ा तालाब में विवेकानंद की प्रतिमा भी सालों बाद ऐसा नजारा देख रही है। लोगों के इनबिल्ट कैमरे दृश्यों को कैमरे में कैद कर रहे हैं। व्हाट्एप ऑन हैं और अब दोपहर तक रायपुर के फेसबुक पेजों पर सैकड़ों फोटो अपलोड हो चुके हैं। हां, मौसम सुहाना जरूर है, लेकिन रायपुर शहर की सीमाओं से ही शुरू हुए खेत, बाड़ी, किसान सब परेशान हैं। खुले में हजारों टन धान है। पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश की आफत के समाचार सबने पढ़े ही हैं। सुहानी सर्दी, उसका साथ देती बारिश, बिजली और हार में गमगीन गर्मी के इन दांवपेंच में उन हजारों लोगों की पराजय न हो, जो लाखों लोगों का पेट भरते हैं। आमीन बकलम: राकेश कुमार मालवीय 
5-3-2014

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