शनिवार, अप्रैल 21, 2012

बचा लो धरा को



राकेश कुमार मालवीय


किसी ने सच ही कहा है हम इस ग्रह पर एकमात्र ऐसी प्रजाति हैं जो संपूर्ण रोजगार के बिना हैं। बहुत खूब। हमारे पास ऐसी अर्थव्यवस्था है जो बताती है कि मौजूदा समय में धरती को बर्बाद कर देना कहीं अधिक सस्ता है बनिस्पत इसकी सुरक्षा, स्थायित्व और पुनर्निमाण के। आप एक बैंक को बचाने के लिए पैसे प्रिंट कर सकते हैं, लेकिन ग्रह केा बचाने के लिए जीवन को पिं्रट नहीं कर सकते। इस वक्त हम एक ओर तो भविष्य की चोरी कर उसे वर्तमान में बेच रहे हैं और दूसरी ओर इसे सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं।
धरा। मतलब पृथ्वी। पुराणों के संदर्भ में मां। और इस धरा की संतानें। सजीव-निर्जीव। स्थायी और चलायमान। इस धरा की हवा, पानी, पेड़-पौधे, जानवर, पषु, पक्षी। संसार की सबसे खूबसूरत रचना। मां पर सभी का बराबर का अधिकार है। यह एक नैसर्गिक अधिकार है। सभी को इसका इस्तेमाल करने का पूरा-पूरा हक है, और संरक्षण की जिम्मेदारी भी। अफसोस, इतनी खूबसूरत धरती को हम संभालकर नहीं रख सके। हम विकास करते गए और विकास के पीछे-पीछे विनाश की आहटे भी। पानी को गंदा करके रख दिया। हवा में धुआं ठूंस दिया। नदियों को बहने से रोक दिया। जंगलों को काट डाला या बांधों में डुबो दिया। और यह सब विकास के नाम पर। अफसोस तो यह है कि यह विकास भी दुनिया के बीस प्रतिशत लोगों के लिए है। सच तो यही है कि इस सुंदर धरती के संसाधनों का उपयोग दुनिया के चंद लोगों के लिए हुआ है, वह भी संरक्षणवादी अवधारणाओं से बिलकुल प्रतिकूल अधिक से अधिक दोहन कर लेने, शोषण कर लेने की नीयत के साथ। इसका असर हम साफ देख रहे हैं, अब भी नहीं चेते तो भविष्य में दुनिया में यह गैर बराबरी वाला विकास हमारी इस दुनिया को बर्बादी के ही रास्ते पर आगे बढ़ाएगा।

धरती के संरक्षण की जब हम बात करते हैं तो अमूमन इसे पर्यावरण के साथ जोड़कर देखा जाता है। जाहिर तौर पर धरती के लगातार गर्म होने, तमाम तरह के कचरे से उसे पाट देने, धरती को लगातार तरह-तरह के खनिजों के लिए खोदने सहित हवा-पानी के संकट वैश्विक रूप से मौजूद हैं। देष-दुनिया में तमाम बहस-मुबाहिसों के बीच इन सवालों को उठाया जाता रहा है। धरती के संकट को एक अलग नजरिए से समझने की जरूरत भी है। वह यह कि नीतिगत रूप से हम धरती को और प्राकृतिक संसाधनों को किस दृष्टि से देखते हैं। सरकार और समाज की समान रूप से भागीदारी इस बात को लेकर भी है कि वह किस तरह से प्रकृति के संरक्षण को लेकर अपने कदम उठाती है। पिछले सालों में इस दिशा में सरकारी ने नई-नई नीतियां बनाई हैं। इसमें सबसे ताजा उदाहरण भूमि अधिग्रहण बिल का मामला है। दूसरा मामला नई राष्ट्रीय जल नीति को लेकर है। इन दोनों ही नीतियों में एक खास बात यह है कि इनके तमाम प्रावधान संरक्षण की बात कम करते हैं प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की बात अधिक करते हैं। उनके व्यावसायिक उपयोग की बात करते हैं। जब नीतिगत रूप से कुछ कानून और नीतियां बनाकर धरती को बर्बाद करने की साजिष रची जाएगी तब हम प्रकृति के संतुलन की बात कैसे कर सकते हैं।

इस बात को हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हालिया कथन से और भी स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। प्रधानमंत्रीजी ने अपने भाषण में कहा कि पानी जैसे अमूल्य संसाधनों का मूल्य बहुत कम है इसलिए इनकी कीमत बढ़ाई जाने की आवश्‍यकता है। यह बात बहुत हास्यास्यपद लगती है। पर वास्तव में यह किसी मूर्खता में कही गई बात नहीं बल्कि पानी और उस जैसे तमाम संसाधनों को बाजार के दबाव में व्यवसाय बना देने की बानगी लगती है। अर्थशास्‍ऋ के ज्ञाता प्रधानमंत्री महोदय को यह तो अच्छे से पता है कि पानी का मूल्य कितना और क्यों होना चाहिए, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि पानी के दुरूपयोग की जो बात वह इतने सामान्य ढंग से कह रहे हैं, उस देष में आखिर कौन सा वर्ग कितने पानी का उपयोग कर रहा है। पर्यावरण के साथ सबसे बड़ा संकट भी यही है। दुनिया का एक तबका जो बमुष्किल बीस प्रतिशत भी नहीं है अपनी सुविधा और सम्मान के लिए प्रकृति के तमाम संसाधनों पर अपना हक जमाए बैठा है। यह ऐसा संकट है जिसने प्रकृति के नजदीक और संरक्षणवादी तरीकों को पूरी तरह ध्वस्त कर बाजार आधारित शोषणकारी व्यवस्था बना ली है।

 दूर क्यों जाईये। अपने मालवा को ही ले लीजिए। मालवा की कृषि विविधता पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल हुआ करती थी। लेकिन हमारी सरकारों ने ही एक तय नीति बनाकर सोयाबीन की फसल को हरित और नगदी फसलों के नाम पर प्रोत्साहित किया। सोयाबीन का हमारे समाज के लिए खाद्यान्न के बतौर कोई इस्तेमाल नहीं है, लेकिन अमेरिका में यह सुंअरों के लिए बहुत उपयोगी है। सुअर सोयाबीन खाकर हष्ट-पुष्ट होंगे और सुअरो को खाकर अमेरिकी। अब यही सोयाबीन की फसल मालवा ही नहीं पूरे मध्यप्रदेष में संकट की खेती साबित हो रही हैं। इस असंतुलन के लिए कौन जिम्मेदार है। यहां यह समझना जरूरी है कि दुनिया का सबसे बड़ा प्रदूषक उत्पादक देष अमेरिका ही है। यहां दुनिया की पांच प्रतिषत आबादी रहती है और 25 प्रतिषत प्रदूषण यहीं से फैलता है। 30 करोड़ की आबादी वाले इस मुल्क में 25 करोड़ चार पहिया वाहन हैं। चार लोगों के परिवार में औसतन तीन से चार गाडि़या हैं। हालांकि इस दिषा में कुछ समझौते भी हुए हैं, जिनमें विकसित देषों द्वारा उत्पादित किए जाने वाले प्रदूषण को कम करके 1990 की स्थिति में लाने की बात कही गई है।

द मिलेनियम प्रोजेक्ट की रिपोर्ट में भारत को उन विकासषील देषों में शुमार किया गया है जहां कि भविष्य की चुनौतियां काफी ज्यादा हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत के भविष्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती आबादी के कारण संसाधनों का संकट है। आंतरिक अषांति, गरीबी-अमीरी की बढ़ती खाई का संकट और भ्रष्टाचार प्रमुख हैं रिर्पोअ में कहा गया है कि संसाधन की कमी और आर्थिक असमानता सामाजिक अषांति की सबसे बड़ी वजह हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक 2020 में भारत की आबादी लगभग एक अरब 33 करोड़ और 2040 में 57 करोड़ हो जाएगी। इससे संसाधनों पर भारी दबाव पड़ेगा और असंतुलन और अधिक बढ़ेगा। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार को एक ठोस और प्रभावी नीति के जरिए आगे बढ़ना होगा, यह नीति प्राकृतिक संसाधनों के अधिक से अधिक दोहन कर उसे बाजार के हवाले कर देने की नीयत वाली कतई नहीं हो सकती। इसके लिए संरक्षण की बात होनी चाहिए। वहीं संरक्षण जिसके हमारे पुरखों ने कई सदियों से हमारे लिए इस धरती को संभालकर रखा। अफसोस जैसे कि हमने शुरूआत में जिक्र किया हम एक ओर तो भविष्य की चोरी कर उसे वर्तमान में बेच रहे हैं और दूसरी ओर इसे सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं।

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