गुरुवार, जुलाई 28, 2011

रानीताल के बहाने बुंदेलखंड


photo@gagan nayar
राकेश  कुमार मालवीय

रानीताल नाम के साथ ही ताल शब्द पानी और समाज का रिश्ता जोड़ता है। ताल यानी तालाब। जाहिर है यह अपने आप में पानी की समृद्ध परम्परा को भी अपने में समेटे होगा। रानीताल गांव में प्रवेश करते ही आपको इसका आभास हो भी जाता है। यहां एक ताल भी आपका स्वागत करता है और एक बावड़ी भी। दोनों का आकार और क्षमता इतनी कि पूरे गांव की प्यास बुझाने में सक्षम है। यह अलग बात है कि पिछले चार-पांच साल लगातार कम बारिश ने इन्हें रीता कर दिया। अब यहां कहने भर को ताल और बावड़ी है, पर दरअसल गांव बेपानी हो चुके हैं। माना जाता है कि जो गांव बेपानी हो जाता है उसका आधा अस्तित्व स्वतः ही समाप्त हो जाता है। यह कहानी बुंदेलखंड के रानीताल गांव की ही नहीं पूरे बुंदेलखंड की दास्तां है। 

रानीताल छतरपुर जिले की बड़ा मलेहरा तहसील का एक गांव है। छतरपुर से लगभग साठ किलोमीटर दूरी पर बसा गांव है। रानीताल गांव के दो तालाब इस गर्मी में पूरी तरह सूख गए थे। गांव के पास ही बहने वाली नदी ने भी बुंदेलखंड की अन्य नदियों की तरह ही दम तोड़ दिया था। गांव के एक नलकूप में भी केवल शाम को ही थोड़ा-बहुत पानी आता था। गांव के दो कई सौ फिट गहरे कुएं केवल अपनी गहराई से भय पैदा करने के अलावा और कुछ नहीं करते। पाले ने कर्ज लेकर बोई गई अरहर और गेहूं की फसल को पूरी तरह बर्बाद कर दिया। मध्यप्रदेश  के कई गांवों ने तो विकास की रौशनी नहीं देखी पर रानीताल गांव की कहानी इस मायने में दर्दनाक हो जाती है कि यहां समृद्धि के बाद बर्बादी का सिलसिला शुरू हुआ। हाई स्कूल तक की शिक्षा  देने वाला यह गांव अपने रहवासियों को इस संकट से निपटने का कोई भी पाठ नहीं पढ़ा पा रहा था। लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि रानीताल पुलिस चैकी में आखिर इस संकट के जिम्मेदार कौन लोगों के प्रति रिपोर्ट लिखाएं। हां बुंदेलखंड पैकेज पर राजनीति के दो समूह यहां जरूर खड़े दिखाए दिए। ठीक वैसे ही जैसे बाकी के बुंदेलखंड में दिखाई देते हैं। चाहे उत्तरप्रदेष का हिस्सा हो या मध्यप्रदेश का। 

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यह बात अलग है कि बुंदेलखंड के जानकारों की राय है कि बुंदेलखंड को किसी पैकेज की जरूरत नहीं हैं। बुंदेलखंड में विकास को सही दिषा देने और प्रकृति को फिर से समृदध बनाने के लिए यहां के लोग चिंतित हैं। वह मानते हैं कि पैकेज किसी वक्त विशेष में मदद तो कर सकता है, लेकिन यह स्थायी राहत देने में कतई सक्षम नहीं हैं। बुंदेलखंड के विकास को दिषा देने के लिए छतरपुर के गांधी आश्रम में हालिया आयोजित बैठक का जिक्र करना यहां बेहद प्रासंगिक है। इस बैठक में सूखे राजस्थान में पानी की परम्परा को पुर्नजीवित करने वाले राजेन्द्र सिंह राणा ने कहा कि बुंदेलखंड को प्रकृति ने भरपूर नियामत दी है। इसे केवल सलीके से संवारने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि प्रकृति को सुधारने के नाम पर यहां करोड़ों रूपए खर्च किए गए हैं, लेकिन सही दिषा नहीं होने से बुंदेलखंड के परिद्रश्य में कोई खास फर्क नजर नहीं आता है। राजेन्द्र सिंह कहते हैं कि इंजीनियर की टेक्नोलाॅजी शोषण पर आधाारित हैं। यहां केवल यह किया गया है कि धरती के पेट में कितना पानी है उसका पता लगाओ और उलीच लो। इससे कोई स्थायी विकास की प्रक्रिया नहीं हो सकती है। इससे विकास हो सकता है लेकिन समृद्धि नहीं आ सकती। इसके लिए यह समझना होगा कि इंसान प्रकृति का नियंता नहीं बल्कि  उसका एक हिस्सा है। यदि प्रकृति का विनाश  होगा तो मानव का भी निश्चित है। रानीताल के गांव की बनावट देखकर यह आसानी से समझा भी जा सकता है। पक्के मकान, और दूसरी सुविधाएं देखकर सहज अंदाजा हो जाता है कि एक दशक  पहले यह गांव इतना बदहाल कतई नहीं था। महज पांच साल में ही हालात कुछ यूं हो गए कि गांव के ज्यादातर लोगों को पलायन पर मजबूर होना पड़ा। बुंदेलखंड के दूसरे गांवों की तरह ही। पन्ना, छतरपुर, दमोह, टीकमगढ़ इन सारे शहरों से दिल्ली जाने वाली बसों को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि बुंदेलखंड से आखिर किस स्तर तक पलायन हो रहा है। 

 आईआईटी की नौकरी छोड़ बुंदेलखंड के विकास की लड़ाई में शामिल हुए पर्यावरणविद् भारतेन्दु प्रकाश बताते हैं पलायन रोकना है तो खेती को ठीक करना होगा और इसके लिए सबसे पहले मिट्टी, पानी, को संरक्षित करने की जरूरत है। पारम्परिक जलस्रोतों की रक्षा के साथ ही नए तालाबों का निर्माण भी बेहद जरूरी है। बुंदेलखंड में केन-बेतवा जोड़ो परियोजना घातक सिद्ध होगी। इससे क्षेत्र में पलायन बढे़गा, विस्थापन होगा। 

भारतेन्दु प्रकाश की गणना को जब रानीताल गांव पर लागू किया जाता है तो स्थिति सच ही दिखाई देती है। रानीताल गांव के बुजुर्ग षिवनारायण कहते हैं कि ऐसी स्थिति तो कभी नहीं बनी कि आधे गांव को काम के लिए बाहर जाना पड़ा हो। सूखे से तो किसी तरह निपट ही रहे थे, इस साल पाले ने भी रही-सही कसर पूरी कर दी।

गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता और छतरपुर में जैविक पद्धति से खेती कर रहे संजय सिंह कहते हैं कि जलवायु परिर्वतन का सबसे ज्यादा असर बुन्देलखण्ड पर हुआ है इसलिए युद्ध स्तर पर यहां जंगल को फिर से  खड़ा करना होगा साथ ही तत्काल प्रभाव से उत्खनन रोकना होगा, नहीं तो कुछ ही समय पश्चात् यह क्षेत्र में  सूखा स्थायी रूप लेगा और इस सूखे को कोई पैकेज खत्म नहीं कर पाएगा। 

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