शनिवार, मई 28, 2011

तू चिंता कि करतो यार ताड़ी पी और मजो कर


राकेश कुमार मालवीय

तू चिंता कि करतो यार ताड़ी पी और मजो कर. क्या कोई इस तरह बिंदास हो सकता है. क्या कोई जिन्दगी का फलसफा इतने सरल अंदाज में बयां कर सकता है. क्या कोई किसी अजनबी से आधे घंटे की मुलाकात में ही ऐसा अपनापा बना सकता है. शायद नहीं.  हम तो घर आये मेहमान को चाय भी पूछकर पिलाने लगे हैं. केवल पानी से ही खानापूर्ति  हो जाये  तो टेंशन टली मानते हैं. पर अलीराजपुर जिले के आदिवासी भाई टेमला की मेहमाननवाजी हमें सालों तक याद रहेगी. गए तो थे सिलिकोसिस की पड़ताल करने पर जीवन की रवानगी का दूसरा पहलू  देख सच में उनसे ईर्ष्या ही कर बैठे.   
अलीराजपुर की में सड़क से कोई दो किलोमीटर अन्दर बसा गाँव है कुशलबाई. रास्ता कठिन तो नहीं लेकिन बेहद धूल भरा जरुर था. गाड़ी के पहिये बार- बार धस जाते थे.  ड्राइवर के श्रम ने हमें गाँव के मुहाने तक पहुँचाया. पर गाँव अन्दर ले जाने की हिम्मत न हो सकी. 
दूर दूर बसे घर. इक्का दुक्का पक्के और बाकी कच्चे ही. गाँव में एक जान पहचान वाले व्यक्ति थे.  वह हमें मिल नहीं सके . मजबूरन हम सीधे ही लोगों से मिलने निकल पड़े थे. कोई आधा किलोमीटर की दूरी पर हमें घर मिला. यह एक कच्चा घर था. सामने मुर्गे मुर्गियों का दडबा. नजदीक ही लगा एक हैंडपंप. खेत खाली थे. लेकिन आस पास ताड़ी के पेड़ अपने पूरे यौवन पर थे. हर पेड़ पर लोगों ने खास अंदाज में मटके बांध रखे थे. पेड़ लगातार रस टपकाते  और एक एक बूंद से घड़ा भरता जाता. जिसकी जब मर्जी पेड़ पर से ताड़ी ले आता. पर अमूमन इसके लिए सुबह और शाम ही तय है. 
हम हमेशा की तरह एक के बाद एक सवाल दागे जा रहे थे. जॉब कार्ड है क्या. राशन कार्ड है क्या . कितने दिन राशन मिला. नरेगा की क्या स्थिति है. काम का पेमेंट हो गया. स्कूल कितनी दूर है. मास्टर आते या नहीं. आँगन बड़ी में पोषण आहार मिलता है ?  कोई एएनएम्  आती है या नहीं. टीके लगे. कितने बच्चों का वजन काम है. किन्हीं बच्चों की मौत हुई क्या, बच्चे कहाँ पैदा होते हैं घर में या अस्पताल  में. तमाम सवाल दागकर हम असल मुद्दे सिलिकोसिस पर आये और जान लिया वाकई यहाँ भी लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं. जेमला का बेटा भी गाँव से निकल कर मजदूरी करने गुजरात गया था. उसने वहां पत्थर पीसने वाली फेक्टरी में काम किया और एक साल के बाद जब लौटा तो छाती  में दर्द होने लगा था. काम नहीं बनता और थकान होने लगी. जब शिविर में जाँच कराई तो पता चला सिलिकोसिस बीमारी है. 

रस्सी की खाट पर बैठे-बैठे हमारी नजरें पेड़ के ऊपर टंगे मटकों पर बार बार अटक रही थी. हम उन मटकों के जानकर नहीं थे. लेकिन उनके जीवन में तो वह रचे बसे थे. उनकी आँखों ने हमारे संकोच को पकड़ लिया था. पर इसके बाद उनकी ख़ुशी मानो  और बढ गयी. 

उन्होंने तुरंत घर के अन्दर से एक डब्बा मंगाया. कदम तेज गति से ताड़ी के पेड़ की तरफ बड रहे थे.  सीधे लम्बे पेड़ पर चंद मिनटों में चढ़ जाने का कमाल हम भी देखना चाहते थे. हमारे कदम भी उनके पीछे थे. देखते ही देखते डब्बा कमर में बांधे वह मटकों तक पहुँच गए. कोई चालीस फीट का पेड़ तो जरुर ही रहा होगा वह. मटकों से  एक पतली सी धार सधे हाथों से  डब्बे में आ रही थी. जिस गति से जेमला ऊपर पहुंचे थे  उसी गति से नीचे भी उतरे. सच पेड़ पर चड़ने- उतरने की जो कला वह परंपरा से सीखते हैं वह कोई किताब या स्कूल नहीं दे सकता. हम जो खुद को पढ़ा- लिखा मानते हैं वह तो इस मामले में बिलकुल ही अनपढ़ हैं. 
खैर ताड़ी गिलास में उड़ेली जा रही थी. एक  के बाद एक तीन गिलास.  कोई संकोच नहीं. ताड़ी के मौसम में लोग एक दम मस्त रहते हैं. अपनी ही धुन में. साहब सुबह- सुबह ताजी ताड़ी पी लो. दिन एक दम अच्छा निकलता है. ताकत बनी रहती है. महिलाएं भी पीती हैं. बच्चे भी. कोई नुकसान नहीं. बस ताजी होना चाहिए. थोड़ी पुरानी पीयेंगे तो जरुर शुरुर होगा पर ताजी पीने में कोई गिला नहीं है. स्थानीय संसाधनों और अपने आसपास के परिवेश को वनवासी बखूबी समझते हैं. प्रकृति से उनका रिश्ता रात-दिन का है. वह प्रकृति को जीते हैं और प्रकृति उन्हें. पर आदान प्रदान की यह परंपरा हम आधुनिक लोगों को पिछड़ापन लगती है. उन्हें इस वातावरण से बाहर लाने में हमारी विकास गाथाओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी और नतीजा हम देख ही रहे हैं. लोगों को मजबूरन उनके दायरे से निकल कर बाहर जाना पड़ता है और सिलिकोसिस जैसी बीमारियाँ उन्हें किसी अभिशाप की तरह ही मिलती हैं. क्या उन्हें उनके संसाधनों के बीच उनकी तरह से जीने दिया जाता तो यह मुमकिन था ? कतई नहीं. सरकारों ने उन्हें प्रकृति का रक्षक नहीं भक्षक समझकर बेदखल किया. पर जेमला तो अब भी ताड़ी के पेड़ पर चढ़ कर खुश हो जाता है. उसे ताड़ी पीने में मजा आता है. वह यह भी मानता है कि ताड़ी उसके और उसके बच्चों के लिए फायदेमंद है. ताड़ी पीने के लिए उसे नीचे उतरने तक का इन्तेजार भी नहीं होता. उसका एक गिलास पेड़ पर स्थाई रूप से रखा है. उसकी जब मर्जी होती है वह गटागट गला तर कर जाता है. उसे ताड़ी पिलाने में भी मजा आता है. वह हम सब की चिंताओं को भी कितनी आसानी से यह कह कर दूर कर देता है कि तू चिंता कि करतो यार ताड़ी पी और मजो कर.      

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