बुधवार, अक्तूबर 13, 2010

14 हजार को कुपोषण का दंश

हरदा। शासन की तमाम योजनाओं के बाद भी कुपोषण का कहर कम होता दिखाई नहीं दे रहा है। अकेले हरदा जिले में ही 14 हजार से अधिक बच्चे कुपोषण का दंश झेल रहे हैं। इनमें से भी करीब पौने सात सौ बच्चे गंभीर कुपोषण की श्रेणी में हैं। उधर आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषित बच्चों में स्वास्थ्य सुधार के लिए प्रारंभ की गई शक्तिमान योजना भी बंद पड़ी है।

हरदा जिले में 26 फीसदी से अधिक की संख्या में आदिवासी परिवार निवास करते हैं, लेकिन हर वर्ग के 5 वर्ष तक के बच्चों की संख्या करीब 51 हजार है। इनमें से सामान्य श्रेणी के बच्चों की संख्या 36 हजार 834 है। हरदा ग्रामीण में 12 हजार 5, हरदा शहरी में 4 हजार 477, खिरकिया ब्लाक में 9 हजार 6 8 2, टिमरनी ब्लाक में 10 हजार 670 बच्चे शामिल हैं।
महिला एवं बाल विकास के सितम्बर माह की रिपोर्ट के अनुसार आंकड़ों पर नजर डालेें तो हरदा शहर की स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों से बदतर नजर आती है। जहां हरदा ग्रामीण क्षेत्र में कुपोषितों की संख्या 1222 है, तो वहीं हरदा शहर में कुपोषितों की संख्या 1413 है। टिमरनी ब्लाक में कुपोषितों की संख्या 5 हजार 863 तथा खिरकिया ब्लाक में कुपोषितों की संख्या 5 हजार 4 है। इससे भी भयावह स्थिति गंभीर कुपोषितों की है। जिले के 673 बच्चे गंभीर कुपोषण की श्रेणी में रखे गए हैं। हरदा ग्रामीण में गंभीर कुपोषितों की संख्या 222, हरदा शहर में 43, टिमरनी ब्लाक में 211 तथा खिरकिया ब्लाक में 197 बच्चे गंभीर कुपोषित हैं।

एक वर्ष से बंद है शक्तिमान योजना
आदिवासी इलाकों के 20 ग्रामों में शासन ने शक्तिमान योजना शुरू की थी। इस योजना में नियमित पोष्ाण आहार के अतिरिक्त बच्चों को अंडे, अंकुरित चने सहित पौष्टिक आहार दिया जाना था। लेकिन यह योजना करीब एक वर्ष से बंद पड़ी है।

अधिकारियों की बानगी
जहां जिले के 51 हजार बच्चों में से करीब 14 हजार बच्चे कुपोषण की श्रेणी में हैं। करीब पौने सात सौ बच्चे गंभीर कुपोषितों की श्रेणी में हैं, लेकिन विभाग के अधिकारियों का फिर भी यही कहना है कि जिले में कुपोषण की स्थिति बेहद न्यूनतम है। इससे हालात का अनुमान लगाया जा सकता है।

पोषण पुनर्वास में रूचि नहीं
जिले में यूं तो हरदा, टिमरनी और खिरकिया ब्लाकों में पोषण पुनर्वास केन्द्र संचालित हैं। बच्चे भी यहां दाखिल हैं, लेकिन फिर भी काफी माता-पिता अपने कुपोषित बच्चों को पुनर्वास केन्द्र में दाखिल करने से कन्नी काटते हैं। खासकर ग्रामीणों का यह तर्क रहता है कि एक बच्चे को दाखिल करने के साथ उसकी मां को भी पुनर्वास केन्द्र में कम से कम एक हफ्ते तक रहना पड़ता है, जिससे घर-परिवार की पूरी व्यवस्थाएं भंग हो जाती हैं, इसलिए माताएं अपने बच्चों को पोषण पुनर्वास केन्द्र में दाखिल कराने से बचना चाहते हैं।
कुपोषण में सुधार होगा
हरदा जिले में कुपोषण अत्यंत न्यूनतम स्थिति में है। इसे भी सुधारने के प्रयास किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री द्वारा प्रारंभ किए जाने वाले अटल बाल आरोग्य मिशन के तहत भी कुपोषण में सुधार होगा। मदर्स क्लब बनाए जा रहे हैं, जिसमें स्वस्थ मां एवं बच्चे को पुरस्कृत किया जाएगा, इससे प्रोत्साहन भी मिलेगा और कुपोषण पर भी अंकुश लगेगा।
- अंशुबाला मसीह, जिला कार्यक्रम अधिकारी, महिला एवं बाल विकास, हरदा
 
साभार : पत्रिका  

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