मंगलवार, सितंबर 14, 2010

' सड़ती व्यवस्था ' में अनाज


राकेश  कुमार मालवीय

मनमोहन सिंह संभवत: दुनिया के पहले और अनूठे प्रधानमंत्री होंगे जिन्हें गोदामों में अनाज सड़ाना तो मंजूर है पर गरीबों में बांट देना नहीं। केवल वही नहीं उनके मंत्रीमंडल के सिपहसालार भी उनके राग में अपने सुर मिलाकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों  की लगातार अवमानना भी कर रहे हैं। नीति-नियम, कायदे-कानून, दिशा-निर्देश  को गर छोड़ भी दें तो इंसानियत के पैमाने पर यह एक सामान्य सी बात हो सकती है कि अनाज सड़ने से अच्छा है उसे बांट दिया जाए, ताकि वह किसी जरूरतमंद के काम तो आ सके। पर क्या हमारी सरकारों को यह सामान्य सी बात भी समझ नहीं आ रही। क्या हम एक संवेदनशून्य  व्यवस्था के अंग बन गए हैं। हमारी व्यवस्था राजनीतिक प्रपंचों, इच्छाशक्ति के अभाव, कर्जदारी या फिर अंतरराष्ट्रीय दबावों के आगे इतनी नतमस्तक हो गई है कि वह अपने लोककल्याणकारी शासन की अवधारणा को सिरे से खारिज करती जा रही है। 
 पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने आदेश  दिया था कि गोदामों में अनाज का एक दाना भी सड़ना नहीं चाहिए और उसे गरीबों में बांट देना चाहिए। इस पर शरद पवार साहब और यूपीए सरकार का रूख था कि अनाज बांटना संभव नहीं है। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने फिर फटकार लगाई और कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट की सलाह नहीं आदेश था। इस फजीहत के बाद भी देश  के नेतृत्व को बात समझ में नहीं आई और अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट को ही सलाह दे डाली है कि वह सरकार के कामकाज में टांग नहीं अड़ाए।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय कोई नया नहीं है। पिछले कई सालों से कोर्ट इस बात से चिंतित रहा है कि देश में एक ओर लोग भूखे पेट सो रहे हैं और दूसरी ओर गोदामों मे अनाज भरा पड़ा है। अनाज भरा होना एक हद तक जायज माना जा सकता है, लेकिन जब यही अनाज बेहद असुरक्षित परिस्थितियों में सड़ने लगे, खराब होने लगे तब कोई भी व्यवस्था चुप नहीं रह सकती है। कोर्ट ने अब से दस साल पहले यानी 2001 में भी एक महत्वपूर्ण आदेश दिया था। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीएन किरपाल, जस्टिस संतोष हेगड़े और जस्टिस ब्रजेश  कुमार ने अपने आदेश  में कहा था कि 'अदालत की चिन्ता यह देखना है कि गरीब लोग, दरिद्रजन तथा समाज के कमजोर वर्ग भूख और भुखमरी से पीड़ित न हों। इसे रोकना सरकार का एक प्रमुख दायित्व है, चाहे वह केन्द्र हो या राज्य। इसे सुनिश्चित  करना नीति का विषय है, जिसे सरकार पर छोड़ दिया जाए तो बेहतर। अदालत को बस इससे संतुष्ट होना चाहिए और इसे सुनिश्चित भी करना पड़ सकता है कि जो अन्न भण्डारों में खासकर भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में भरा पड़ा है, वह समुद्र में डुबोकर या चूहों द्वारा खाया जाकर बर्बाद न किया जाए।' प्रधानमंत्री ने उल्टे सुप्रीम कोर्ट को ही कह दिया कि सरकार को नीति निर्धारण में दखल नहीं देना चाहिए। उनका पक्ष अपनी जगह सही हो सकता है, लेकिन सच्चाई यह है कि सरकार अनाज की हिफाजत करने में नाकारा साबित हुई हैं। यदि गोदामों में अनाज सड़ने की स्थिति ही नहीं आती तो कोर्ट को इस कवायद की जरूरत ही नहीं पड़ती।
उधर पिछले दिनों राज्यसभा में कृषि राज्य मंत्री प्रो केवी थॉमस ने खुद स्वीकार किया था कि देश भर में भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में 11 हजार 708 टन खाद्यान्न या तो खराब है या फिर जारी करने योग्य नहीं है। इस खाद्यान्न का मूल्य लगभग पौने सात करोड़ रूपए है। यह इस साल 1 जुलाई तक की स्थिति थी। इसके बाद देश भर के कई हिस्सों में जोरदार बारिष हुई है और कई लाख टन अनाज खुले में पड़ा हुआ था।

देश में लोगों के पेट भरे हों तब तो यह सोचा जा सकता है कि मुफ्त के भाव अनाज नहीं बांटा जाए, लेकिन यदि 42 करोड़ लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हों तब यह बात क्या हजम करने लायक है कि देश  में एक भी अनाज का दाना सड़े।
गौरतलब है कि गरीबी की रेखा के नीचे देश  के 6.52 करोड़ परिवार पाए गए हैं, लेकिन दूसरा पहलू यह है कि इस सूची से इससे कहीं ज्यादा यानी 7.5 करोड़ परिवार को बाहर कर दिया गया है। योजना आयोग ने दावा किया था कि देश में 28.3 प्रतिशत  परिवार गरीबी की सूची के दायरे में आते हैं। पर बाद में तेंदुलकर आयोग ने कहा कि भारत में 37.5 प्रतिशत  परिवार गरीब हैं। गांवों में 41.8 प्रतिशत परिवार गरीब हैं। दिलचस्प बात यह है कि तेंदुलकर समिति की स्थापना भी योजना आयोग के द्वारा ही की गई थी। और इसके बाद गरीबी के अनुमान के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय ने भी एक जांच समिति बैठाई। डॉ एनसी सक्सेना की अध्यक्षता वाली इस समिति के मुताबिक आधा ग्रामीण भारत गरीबी के दायरे में है। देष की 76.8 प्रतिशत आबादी को पूरा पोषण नहीं मिलता और 77 प्रतिशत लोग हर दिन 20 रूपए से कम आमदनी में गुजारा करते हैं।
जब सरकार की ही अलग-अलग समितियां देश का यह चेहरा दिखा रही हैं तब अनाज के उचित वितरण की व्यवस्था से कैसे मुंह मोड़ा जा सकता है।
कुछ साल पहले तक ही देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए खाद्यान्न और अन्य सुविधाएं सभी के लिए मुहैया कराई जाती थीं। लेकिन इसके बाद गरीबी रेखा की सूची बनाकर एक नए वर्गीकरण की प्रक्रिया को अंजाम दिया गया। इस प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की एक अलग फेहरिस्त है, लेकिन जब नीतिगत प्रक्रिया यह मानती है कि देश  में इतने लोग तय मानकों के अनुसार गरीब हैं तब उनको अनाज देने में कौन से मुश्किलात  पैदा हो सकते है, जैसा कि प्रधानमंत्री कह रहे हैं।
सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात तो यह है कि जो कुछ भी करना है उसे एक निर्धारित समय सीमा में करना बहुत जरूरी है। क्योंकि जब तक हम बहस में उलझे रहेंगे तब तक गोदामों में कई टन अनाज फिर सड़ जाएगा, कई टन अनाज चूहे खा जाएंगे, कोर्ट फिर जवाब-तलब करने में मशगूल होगी, सरकारें फिर वहीं जवाब देंगी और देश के 42 करोड़ भूखे लोगों की संख्या घटने की बजाए फिर निरंतर बढ़ती जाएगी।




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