सोमवार, अगस्त 16, 2010

केवल खाद्यान्न नहीं, पोषण सुरक्षा चाहिए

राकेश मालवीय 

 कुछ साल पहले तक ही सरकार देश  को खाद्य संप्रभु देष घोषित करती थीं। खाद्यान्न के मामले में हमें न केवल आत्मनिर्भर बल्कि निर्यात करने जैसी स्थिति में होने का दावा भी किया जा रहा था, लेकिन अब जबकि प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून के तहत लोगों को खाद्य सुरक्षा की गारंटी देने की बात आ रही है तो सरकार अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश  कर रही है बल्कि कहा यह भी जा रहा है कि जरूरत के हिसाब से खाद्यान्न उपलब्ध कराने में सरकार सक्षम नहीं है। इसके मायने तो यही हैं कि हम खाद्यान्न मामलों में अब भी आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। कृषि प्रधान देश होने के बावजूद खाद्यान्न कि संकट से निपटने में हम अभी बहुत पीछे हैं।
 वास्तव में भूख या भूखजनित कारणों से किसी भी नागरिक की मृत्यु सबसे बड़ा कलंक है। यह तथ्य बेहद दुखी करने वाला है कि लगभग दस फीसदी विकास दर का दंभ भरने वाले देष में 42 करोड़ लोग भूखे सोने पर मजबूर हैं। चाहे उड़ीसा के कालाहांडी का मामला हो, चाहे मध्यप्रदेश  के आदिवासी इलाके या फिर रौशनी  से सराबोर महानगरों की झुग्गी-बस्तियों का। यह हैरत की ही बात है कि आजाद भारत के साठ सालों के इतिहास में हम बेहतर और सभी को भूख से मुक्त करने की संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं निभा पाए। योजनाएं बनीं भी तो अंतिम लक्ष्य तक पहुंचते-पहुंचते खुद ही कालातीत हो गईं। देश में इस दिशा  में जो भी कार्यक्रम बनाए गए वह लक्ष्य आधारित ज्यादा रहे हैं। उनका मकसद सिर्फ आंकड़े पेश  करके अपनी जिम्मेदारियों को सतही तौर पर पूरा करना रहा है। जबकि इसका लक्ष्य देश को पूरी तरह से भूख से मुक्ति दिलाना होना चाहिए था। अफसोस है किसी भी सरकार ने अब तक इस बात के लिए प्रबल इच्छाशक्ति नहीं दिखाई है।
    पिछले दशक  में खाद्य सुरक्षा के नाम पर जो कुछ भी प्रक्रियाएं चली हैं उन्होंने एक हिस्से को तो लाभ पहुंचाया, लेकिन उनसे जनित कारणों से वंचित और हाशिये  पर जाने वाला समाज भी बड़ा रहा। गरीबी रेखा के इस पार और उस पार के दायरे में भूख से पिसने वाले वर्ग की कहानियां जब-तब हमने पढ़ी हैं। विस्थापन की त्रासदी भोगने वाले समाज को मुआवजा देने के बाद पूरी तरह से खाद्य सुरक्षा के दायरे से अलग कर दिया गया। जबकि उस समाज के पास आजीविका का सबसे बड़ा संकट आसन्न था। घरों में सस्ते शौचालय बन जाने के बाद हजारों लोगों को इस सूची से गायब कर दिया गया। कई आदिवासी इलाकों में नागरिकों ने जहरीले कंद को नदी के पानी में रखकर उन्हें खाने लायक बनाया। हालांकि उनका पूरा जहर कभी उतर नहीं पाया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें खाना उनकी मजबूरी रहीं। बिहार के मुसहर जाति के लोगों ने चूहों के बिलों में से अनाज के दाने निकालकर भूख से मुक्ति पाने की नाकाम कोषिषें कीं तो कई जगह गोबर में से अनाज बीनने की असम्मानजनक कवायदें भी नजर आईं। और जबकि अब प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून रौशनी  की एक किरण नजर आता है तब गरीबी की परिभाषाओं, गरीबों की गिनती को लेकर बहस खड़ी हैं।
 गौरतलब है कि गरीबी की रेखा के नीचे देश के 6.52 करोड़ परिवार पाए गए हैं, लेकिन दूसरा पहलू यह है कि इस सूची से इससे कहीं ज्यादा यानी 7.5 करोड़ परिवार को बाहर कर दिया गया है। योजना आयोग ने दावा किया था कि देश में 28.3 प्रतिशत  परिवार गरीबी की सूची के दायरे में आते हैं। पर बाद में तेंदुलकर आयोग ने कहा कि भारत में 37.5 प्रतिशत  परिवार गरीब हैं। गांवों में 41.8 प्रतिशत  परिवार गरीब हैं। दिलचस्प बात यह है कि तेंदुलकर समिति की स्थापना भी योजना आयोग के द्वारा ही की गई थी। और इसके बाद गरीबी के अनुमान के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय ने भी एक जांच समिति बैठाई। डॉ एनसी सक्सेना की अध्यक्षता वाली इस समिति के मुताबिक आधा ग्रामीण भारत गरीबी के दायरे में है। देश की 76.8 प्रतिशत आबादी को पूरा पोषण नहीं मिलता और 77 प्रतिशत लोग हर दिन 20 रूपए से कम आमदनी में गुजारा करते हैं। भारत मे न्यूनतम मजदूरी अधिनियम मानता है कि एक मजदूर को इतनी मजदूरी दी जानी चाहिए कि वह हर दिन 2700 कैलोरी की जरूरत को पूरा कर सके। इंडियन कौंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च ने ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रति दिन और शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी माना। तेंदुलकर कमेटी की गणना का आधार शहरी क्षेत्र में 1776 कैलोरी और ग्रामीण में 2100 कैलोरी रहा। इस आधार को लगातार कम किए जाने की प्रक्रियाओं को भी रोके जाने की जरूरत है।
 अब जबकि सरकार द्वारा स्थापित समितियां ही अलग-अलग आंकड़े और तथ्य पेश  कर रही हैं तब केवल 28 प्रतिशत लोगों को ही गरीब मानकर उन्हें खाद्य सुरक्षा देने का भरोसा देष को भूख से मुक्ति के कलंक को दूर करने का जायज तरीका नहीं माना जा सकता। जरूरत इस बात की भी है कि गरीबी के मानकों को एक न्यूनतम सुविधा देने तक ही सीमित न रखकर गुणवत्तापूर्ण जीवन से जोड़कर देखा जाना चाहिए। इन मानकों के जरिए यह तय किया जाना चाहिए कि वंचित समाज कैसे इस पूरी कवायद के जरिए एक सम्मानजनक जीवन की दिशा में अपने कदम बढ़ा सके। और इसके लिए जरूरी है कि खाद्य सुरक्षाशिक्ष्हा  और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं को राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी मानकर बिना शर्त अधिकार के रूप में मानकर दिया जाना चाहिए।
 काफी जददोजेहद के बाद ऐसा लग रहा है कि राषटीय कानून में 35 किलो अनाज की उपलब्धतता को सुनिष्चित कर दिया जाएगा। वहीं दूसरी तरफ कैलोरी के मापदंडों के मुताबिक पांच सदस्यों के एक परिवार को हर महीने सत्तर किलो अनाज की जरुरत  होती है। जरूरत और आपूर्ति के इस अंतर को कैसे पाटा जाएगा, यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है। प्रस्तावित कानून को उत्पादन वितरण और वास्तविक पहुंच की दृष्टि से भी जोड़कर देखा जाना चाहिए।
होना तो यह चाहिए कि लोककल्याणकारी शासन व्यवस्था में लोगों को उनकी जरूरत के मुताबिक खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसके साथ ही तेल और दलहनों को भी इसके दायरे में लाए जाने की जरूरत है। भारत में कुपोषण और भूख से मौतों की वजह प्रोटीन, विटामिन और वसा की अपर्याप्तता है। तब मोटे अनाज ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी जैसे अनाज और दालों को भी शामिल करने की जरूरत है। इसके बिना भारत से कुपोषण को नहीं मिटाया जा सकता है। खाद्य सुरक्षा के लिए जो भी कदम उठाए जा रहे हैं उनमे सिध्दांत के तौर पर पोषण की सुरक्षा का वायदा किया जाना अनिवार्य है। हर महीने तीन किलो तेल की जरूरत के हिसाब से 20 करोड़ परिवारों के मान से 72 लाख मीट्रिक टन तेल की जरूरत होगी। दालों को देखें तो देश में दालों का उत्पादन करीब 86 लाख टन है। इसमें आयात को और जोड़ दें तो पिछले साल भारत में दालों की उपलब्धता 183 लाख टन रही। इस दृष्टि से 67 प्रतिशत और उत्पादन की जरूरत है।
 तीसरी सबसे बड़ी जरूरत यह है कि खाद्यान्न सुरक्षा की प्रक्रियाओं को एक व्यापक दायरे में पूरी पारदर्शिता  से चलाया जाए। देश में योजनाओं का जमीन तक न पहुंचना, स्थितियों में सुधार नहीं होने का बड़ा कारण है। ऐसे कई मामले मौजूद हैं जहां कि सवर्ण समाज के पास तो राषन कार्ड मौजूद है, लेकिन उसी दायरे का आदिवासी समाज इससे वंचित है। ऐसे व्यावहारिक पहलुओं से लड़ाई की तैयारी में कानून की क्या भूमिका होगी्, इस पर भी विचार आवश्यक  है।


 जनसत्ता ( १५ अगस्त २०१०)