गुरुवार, जुलाई 01, 2010

हिंदुस्तानी एंडरसन्स का क्या ?

राकेश  कुमार मालवीय
ह एक काली रात थी। पर ऐसी रातें अब भी अक्सर आती हैं। भयावह मंजर था। अब भी स्थिति कहां बदली है। घोर लापरवाही का एक नमूना पूरी दुनिया ने देखा। अब भी देख ही रहे हैं। तब लोगों का जानलेवा गैस से से दम घुट रहा था। अब भूख से पेट चिपक रहा है। पहले लापरवाही से। और अब उससे भी बड़ी लापरवाही, अव्यवस्था और भ्रष्टाचार से। तब भी उचित इलाज नहीं मिला। अब भी कहां मिल रहा है। फर्क केवल इतना है कि उस एक ही रात में लगभग तीन हजार लाषें सड़क पर बिखरी पड़ी थीं और उसके बाद पच्चीस हजार मौतें और हुईं। (सही आंकड़ा अब तक नहीं दिया जा सका।) और अब मप्र सरकार ने लोकतंत्र के मंदिर में खुद स्वीकार किया कि मप्र में पिछले चार सालों में एक लाख बाईस हजार चार सौ चौबीस बच्चों की मौत हुई है। ( यह सरकारी आंकड़ा है। दूसरे अध्ययन और रिपोर्ट देखेंगे तो स्थिति इससे कहीं ज्यादा दुरूह दिखाई देगी।) क्या यह त्रासदी भयानक नहीं है। क्या यह तस्वीर रूलाने वाली नहीं है।


उस त्रासदी के लिए हम एंडरसन को पकड़ लाने, उसकी गर्दन दबा देने को आमादा हैं। अब उससे भी ज्वलंत सवाल यह है कि इतने बच्चों की मौत के पीछे छिपे देसी एंडरसन्स के लिए हम क्यों नहीं आवाज उठाते। जिस तरह उस कमबख्त एंडरसन के पीछे मीडिया पड़ गया है ( बुरी बात नहीं है) तो इन देसी एंडरसन की खैर-खबर क्यों नहीं ली जानी चाहिए।

 शर्म आती है जब मप्र में बच्चों और महिलाओं के अधिकारों और विकास की तस्वीर हम देखते हैं। बच्चों में साठ फीसदी कुपोषण, सत्तर प्रति हजार षिषु मृत्यु दर, 379 प्रति लाख मातृत्व मृत्यु, 57 फीसदी महिलाओं में खून की कमी। प्रसव के दौरान मौतों के आंकड़े। क्या मप्र में स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतर तस्वीर दिखा पाते हैं। क्या यह मानव विकास के यह आंकड़े सरकार और समाज के लिए शर्म करने वाले नहीं हैं। दरअसल भूख से मौत होना किसी भी समाज के लिए सबसे खतरनाक स्थिति  मानी जानी चाहिए। मध्यप्रदेश  जैसे कृषि आधारित और विकासशील  प्रदेश  में जब इतने बड़े स्तर पर एक के बाद एक बच्चे मर रहे हैं तब विकास की पूरी अवधारणा पर एक गहन चिंतन की आवश्यकता  है। आखिर क्या कारण है कि एक ओर यहीं के खेतों से लाखों टन गेहूं पैदा होकर खुले आसमान में नीचे रखा बारिश  के पानी से भीग जाता है और क्यों किसी इलाके में खाली बर्तनों के कारण घर की खपरैल से धुआं भी नहीं उठ पाता। क्या विकास की इन तस्वीरों पर कोई गौर करेगा।

सरकार बिलकुल भी खामोश  हो ऐसा नहीं है। लगभग 41 हजार करोड़ रूपए के भारी-भरकम बजट वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना आजीविका के लिए एक न्यूनतम मदद का आश्वाशन  तो देती है। लेकिन यदि रीवा के सुदूर अंचल बसे गांव कोनी-कुरैली, जहां कि इस योजना की सबसे ज्यादा जरूरत है और कोनी कुरैली जैसे अन्य दूसरे गांवों में यह योजना नहीं पहुंच पाती तो निष्चित तौर पर यह एक सामयिक और त्वरित विश्लेषण  का विषय है कि इन गांवों में कैसे योजनाएं साकार हो पाएं। सतना जिले में ही रोजगार गारंटी योजना में लोगों को दिनभर काम करने के बाद मजदूरी बीस रूपए ही बन पाती है, क्योंकि जमीनी कठोर है। तब क्या मजदूरी के मूल्यांकन को स्थानीय परिवेश  के मुताबिक नहीं ढाला जाना चाहिए। रीवा ब्लॉक के ही कई गांवों में आंगनवाड़ी सेंटर मजरों-टोलों से पांच से छह किमी की दूरी पर स्थित हैं, जहां तक कि बच्चों और महिलाओं का रोज-रोज पहुंच पाना संभव नहीं हो पाता। राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग के निर्देश के बाद भी संबंधित गांवों में एक साल बाद तक आंगनवाड़ी सेंटर नहीं खुल पाया है। खंडवा जिले के खालवा ब्लॉक में पिछले दिनों फिर आदिवासी बच्चों की मौत हुई। आखिर क्या कारण है कि मप्र में इस मंद त्रासदी को नहीं रोका जा सका है।

दरअसल जंगल और इसके आसपास का समाज अब प्राकृतिक संसाधनों से दूर हो चला है। कई सालों की प्रक्रिया के बाद उनके जंगल आश्रित आजीविका के अधिकार छिनते चले गए हैं। अब हालात यह हैं कि वह समाज न तो जंगल से ही अपना गुजारा कर पा रहा है और न शहरीकरण की प्रक्रिया में शामिल हो सका है। शहर में आकर भी उन्हें ऐसी दुरूह जिंदगी मिलती है जहां मूलभूत सुविधाएं ही नसीब नहीं हो पातीं। बेहतर रास्ता तो यही है कि लोगों को आजीविका के संसाधन उनके स्थानीय परिवेश में ही मिलने चाहिए। लेकिन यदि सत्ततर  फीसदी आबादी प्रति व्यक्ति बीस रूपए से कम आय में अपना गुजारा कर रही हो तो एक सम्मानजनक जीवन प्राप्त करने में कई सालों लग जाएंगे।

इसलिए देश  की मौजूदा तस्वीर को बदलने की महती आवश्यकता है। कैसे समय पर नरेगा का भुगतान हो। कैसे आंगनवाड़ी खुले। बच्चों को पोषण आहार मिले। टीकाकरण हो। स्कूलों में शिक्षक  हों। मध्यान्ह भोजन बने। साफ पानी मिल सके। राशन  दुकान पहुंच में हो। मिट्टी का तेल जमींदारों के डीजल पंपों में न जले। राशन का गेहूं बाजार में नहीं बिके। केवल दशहरे -दीवाली पर शक्कर नहीं मिले। स्वास्थ्य केन्द्र से दवा मिल सके। अस्पताल में सुरक्षित प्रसव हो। प्रसव सहायता राशी  में कमीशन  न देना पड़े।

सवाल यह है कि जब योजनाएं हैं, बजट है, प्रावधान है तो दिक्कत क्या है। और जब राजीव गांधी की हां में हां मिलाते हुए अब राहुल गांधी भी केवल पंद्रह पैसे जमीन तक पहुंचने को लेकर चिंता सार्वजनिक कर रहे हैं तब नीति-नियंताओं को यह सोचना सबसे ज्यादा जरूरी है कि जितना कुछ समाज के लिए है और यदि उतना ही सस्वरूप में जमीन तक पहुंचे तो शायद सरकार को बेहद शर्म के साथ हजारों बच्चों की मौत नहीं स्वीकारनी पड़ी। क्या ऐसे देसी एंडरसन्स को ढूंढा जाना जरूरी नहीं है जो समाज की खाईयों को और गहरा करने का काम कर रहे हैं।