मंगलवार, जनवरी 19, 2010

इन मौतों के लिए जिम्मेदार कौन

सीधी जिले के आदिवासी बाहुल्य ब्लॉक कुसमी में दो माह के दौरान पच्चीस लोगों के मौत हो गई। मृतकों में बाइस बच्चे थे। एक महिला की मौत प्रसव के दौरान हुई, जबकि दो युवा इसमें शामिल थे। कुसमी ब्लॉक के पिपराही और रामगढ़ गांव में मौत का यह तांडव होता रहा। कहने को यहां सरकारी योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन असल में वह चल रही होतीं तो क्या एक के बाद एक बच्चे मौत का शिकार हो रहे होते ! निसंदेह योजनाओं में तो कोताही है ही, पर बर्बादी की कहानी कई सालों पहले लिखी जा चुकी थी, जब यह गांव टाइगर प्रोजेक्ट के अंतर्गत संजय गांधी अभयारण्य में शामिल कर लिए गए थे। 1984 के बाद इन आदिवासी लोगों का जंगल पर से हक छिन गया था और वनोपज के नाम पर वह केवल महुआ बीन सकते थे। तेंदूपत्ता, लकड़ी, दूसरी वनोपज और खनिज संसाधन आदिवासियों के जीविकोपार्जन के जरिया थे। इसी के आसपास आदिवासियों की अर्थव्यवस्था चला करती थी। जंगल का आसरा तो छिना ही सरकार की कोई भी योजना इन आदिवासियों को पूरा रोजगार नहीं दे पाई, आंगनवाड़ी कुपोषण दूर करने में नाकाम रहीं, राशन की दुकानों से पेट भरने लायक अनाज नहीं मिला और सरकार की स्वास्थ्य सेवाएं इन मौतों को रोकने में नाकामयाब रही। इस पूरे मुद्दे को यहां स्थानीय दलित आदिवासी महापंचायत ने शाषन के संज्ञान में भी लेकर आए, लेकिन भ्रष्ट व्यवस्था अब भी आंखें मूंदे निद्रा में मग्न है।
पूर्वी मध्यप्रदेश का एक महत्वपूर्ण जिला है सीधी। इस जिले की बहुसंख्यक आबादी आदिवासी और दलितों की है। पांच ब्लॉक सिंहवास, सीधी, रामपुर, मझौली और कुसमी में बंटे इस जिले में एक जिला अस्पताल, 8 सीएचसी, बयालीस पीएचसी और 145 एसएचसी हैं। जिले की कुल 9 लाख दस हजार 983 लोगों की आबादी में 1 लाख 19 हजार लोग कृषक मजदूर हैं, लगभग तीन लाख लोग किसान हैं और लगभग 1 लाख 07 हजार 395 लघु एंव सीमांत किसान की श्रेणी में आते हैं। घरेलू काम-धंधों एवं कुटीर उद्योगों में लगभग आठ हजार लोग अपनी आजीविका चला रहे हैं, जबकि अन्य श्रमजीवियों की संख्या लगभग 70 हजार है। यहां हरिजन और दलितों की आबादी लगभग 11.9 प्रतिशत है, जबकि 29.9 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है। इस तरह कुल जनसंख्या के 41.8 प्रतिशत लोग इन दो समुदायों से आते हैं।
सीधी जिले के आदिवासी बाहुल्य ब्लॉक कुशमी का एक गांव रामगढ़। भौगोलिक रूप से सीधी-जनकपुर रोड पर ग्राम वस्तुआ से तीन किलोमीटर पश्चिम में स्थित है। रामगढ़ की कुल आबादी 548 है। इसमें बैगा, गोंड और हरिजनों का प्रतिशत ज्यादा है। कुछ संख्या में सामान्य और अल्पसंख्यक समुदाय के परिवार भी हैं। गांव में दो आंगनबाड़ी केन्द्र हैं। रागगढ़ छह मोहल्लों में बसा है। गांव में दो आंगनवाड़ी केन्द्र हैं।
रामगढ़ में कहने को दो आंगनवाड़ी केन्द्र मौजूद हैं। जहां कि कुपोषित बच्चों को नियमित पोषणाहार और अन्य सुविधाएं दी जानी चाहिए, लेकिन केवल 48 दिनों में यहां एक के बाद एक बच्चों की मौत होती रही। रागगढ़ में 25 अगस्त से 11 अक्टूबर की अवधि में 8 बच्चों को मौत ने अपने आगोश में ले लिया। सभी बच्चों की मौत का कारण बुखार एवं कुपोषण पाया गया, जबकि एक व्यक्ति 33 साल का था। जाहिर है यह सामान्य मौते नहीं थीं। यह कोई मरने की उम्र नहीं होती। मरने वाले 9 लोगों में पांच दलित और आदिवासी समुदाय से आते हैं। इनमें से भी दो बच्चे बैगा जनजाति के हैं, जिनके संरक्षण, संवर्धन और उत्थान के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है। उसी जनजाति के बच्चों की कुपोषण और उचित उपचार के अभाव में मौत ऐसी तमाम योजनाओं पर सवाल खड़े करने वाली है। यह ऐसी मौते भी नहीं थीं जो जन्म के तुरंत बाद हो गई हो गईं। ज्यादातर बच्चों ने अपनी जिंदगी शुरूआत कर दी थी, लेकिन पेट भर अन्न नहीं मिला शायद इसीलिए भूख से लड़ाई में किसी ने तीन साल, किसी ने चार साल तो किसी ने छह साल की लड़ाई के बाद अंतत: हार स्वीकार कर ली।
रामगढ़ के पड़ोसी गांव पिपराही की कहानी तो और भी दर्दनाक है। पिपराही गांव में 20 अगस्त से 8 अक्टूबर के बीच कुल 16 मौत दर्ज की गईं। इनमे 14 बच्चे थे। मरने वाले सभी लोग बैगा समुदाय से आते हैं। एक नवजात शिशु अपनी मां के साथ जन्म के तुरंत बाद ही चल बसा। ज्यादातर बच्चों की मौत का कारण उल्टी-दस्त और बुखार होना पाया गया। किसी-किसी को पेट दर्द की शिकायत भी पाई गई।
यह एक आदिवासी बाहुल्य गांव है। गांव को ग्राम पंचायत का दर्जा मिला है। आदिवासियों में भी बैगा जनजाति के लोग अधिक हैं। गांव की कुल जनसंख्या 549 है इनमें बैगा जाति के 274 लोग निवासरत हैं। रोजगार के अभाव में ज्यादातर लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। गौरतलब है कि सरकार बैगा विकास प्राधिकरण के माध्यम से इस विशेष समुदाय के लिए काम कर रही है, लेकिन सीधी जिले के इस क्षेत्र को योजना में शामिल नहीं किया गया है।
सरकारी योजनाओं की हकीकत
रामगढ़ में दलित आदिवासी महापंचायत एवं महिला अधिकार मंच संगठन के कार्यकताओं ने जब रामगढ़ में सरकारी योजनाओं और बच्चों और महिलाओं के हित में चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत देखी तो हालात उन नौ बच्चों की मौत की कहानी कहते नजर आए। गांव में पाया गया कि आंगनवाड़ी में निर्धारित मीनू के आधार पर पोषणआहार नहीं दिया जाता है। मरने वाले कुछ बच्चों के नाम तो आंगनवाड़ी में दर्ज थे और कुछ बच्चों के नाम दर्ज नहीं थे। गांव के ज्यादातर बच्चों की स्थिति ठीक नहीं पाई गई, और वह किसी न किसी स्तर के कुपोषण का शिकार पाए गए। गांव में रोजाना आंगनवाड़ी नहीं खुलने और उसका लाभ सभी बच्चों और महिलाओं तक नहीं पहुंचने की शिकायत दलित आदिवासी महापंचायत के कार्यकर्ताओं ने कलेक्टर को की थी, लेकिन इस पर बच्चों की मौत से पहले कोई एक्सन नहीं लिया गया। माध्यमिक एवं प्राथमिक शाला में चलाए जा रहे मध्याहन भोजन भी मीनू के आधार पर नहीं दिया जा रहा है। यहां बच्चों को प्रतिदिन चावल-दाल और सब्जी ही दी जाती है। ऐसी स्थिति में बच्चों को कुपोषण से बचाया नहीं जा सकता।
ज्ञात हो कि शासकीय मापदण्डों के अनुसार ही एक आंगनबाड़ी केन्द्र में समस्त 40 - 80 बच्चों के लिए बैठने के लिए उचित व्यवस्था, पेयजल की व्यवस्था, पृथक-पृथक शौचालय, पोषणाहार बनाने के लिये अलग कमरा। समस्त दर्ज बच्चों के अनुसार बर्तन, खाना पकाने के अलग बर्तन होना चाहिए। तीन तरह की वजन मशीन ( ट्रे मशीन, साल्टर मशीन तथा एक अन्य मशीन जिससे किशोरी बालिकाओं, गर्भवती व धात्री माताओं का वजन नापा जा सके।) कुपोषित बच्चों की नियमित प्रगति मापने के लिये दृष्टि चार्ट, अनौपचारिक शिक्षण के लिये चार्ट व अन्य शिक्षण सामग्री, सामान्य व कुपोषित बच्चों के लिये अलग-अलग प्रकार के खिलौने इत्यादि। इसके अलावा आयरन फोलिक एसिड की दवाएं व अन्य सामान्य दवायें भी उपलब्ध होनी चाहिए।
इसी तरह पोषणाहार यानी समेकित बाल विकास सेवा का एक अनिवार्य अंग। महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा निर्धारित मापदण्डों के अनुसार ही लक्षित समूह को प्रतिदिन पके पोषणाहार का वितरण किया जाना चाहिए ।
स्वास्थ्य सेवाओं की हालत
दलित आदिवासी महापंचायत संगठन ने पाया कि गांव में बच्चों को बीमार होने पर त्वरित उपचार की कोई खास सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। रामगढ़ का सबसे नजदीकी स्वास्थ्य केन्द्र भी गांव से दस किलोमीटर दूर पोड़ी गांव में है। यहां एमपीडब्ल्यू की जगह कई वर्षों से खाली है। एएनएम के द्वारा क्षेत्र में भ्रमण नहीं किया जाता है। गांव के शत-प्रतिशत बच्चों का टीकाकरण भी नहीं हुआ है। यहां से तीन किलोमीटर दूर वस्तुआ गांव में उप स्वास्थ्य केन्द्र है, लेकिन वहां पर भी चौबीस घंटे कोई कर्मचारी नहीं रहता है, इससे बच्चों को बीमार होने की दषा में उचित उपचार नहीं मिल पाता, और इसके नतीजे बच्चों की लगातार मौत के रूप में सामने आती है। एएनएम माह में केवल एक बार ही रामगढ़ और पिपराही गांव में आती थी। गांव के बच्चों का किसी भी तरह का टीकाकरण यहां नहीं हुआ। बच्चों की लगातार मौत के बाद उसे सस्पेंड कर दिया गया। डॉक्टर ने मौत की वजह गंदा पानी पीना बताया, लेकिन सच यह है कि इन दो गांवों में कुपोषण का स्तर बेहद चिंताजनक था, और मरने वाले अधिकतर बच्चे इसका शिकार थे। यह बात भी सामने आई कि बच्चे मध्याहन भोजन में पिछले पांच-छह माह से मटला की दाल खा रहे थे, विशेषज्ञों के मुताबिक इस दाल को खाने योग्य नहीं माना जाता है।
रामगढ़ की नजदीकी राशन दुकान वस्तुआ गांव में स्थित है। ग्रामवासियों के मुताबिक उन्हें राशन दुकान से उचित मात्रा में खाद्यान्न नहीं दिया जा रहा है। कार्ड में अनाज की मात्रा 35 किलोग्राम दर्ज की जाती है। जबकि हितग्राहियों को 25 या 30 किलोग्राम खाद्यान्न ही दिया जा रहा है। वस्तुआ गांव की राशन दुकान भी विवाद के कारण लगभग दो माह पहले से बंद पड़ी थी। नीले राशन कार्ड पर भी 35 किलोग्राम खाद्यान्न देने के निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने दिए हैं, लेकिन यहां 18 किलोग्राम अनाज ही उपलब्ध कराया जा रहा थ। गांव के रामभजन बैगा, मोतीलाल, राधेश्याम , महावीर, शिवनाथ बालसा, दलकेष्वर, कुंजीलाल, रामसिया, मोलिया, तेजमान ने राशन दुकान से उचित मात्रा में खाद्यान्न नहीं मिलने को लेकर जिला कलेक्टर से गुहार भी लगाई, लेकिन इसके बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हो सका है।
रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत यहां जॉबकार्डधारियों को काम तो मिलता है, लेकिन पिछले डेढ़ साल से उन्हें अपने काम का भुगतान नहीं मिला है।

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