मंगलवार, दिसंबर 29, 2009

मैं किसान का बेटा नहीं हूं

राकेश कुमार मालवीय
क्या हम कृषि प्रधान देश के नागरिक होने पर गर्व कर सकते हैं। यह बात राष्ट्रीय त्योहारों पर भाषणों में अच्छी लग सकती है, पर सच्चाई यह है कि खुद को किसान कहलवाना ठीक वैसा सुख नहीं देता जैसा कि एक नौकरीपेशा को अपना पद बताते हुए। एक इंजीनियर, एक डॉक्टर, एक अध्यापक और एक किसान होने में बहुत बड़ा फासला है। यही फासला खुद किसानों को खेती से दूर करने की मौन प्रक्रिया को संचालित कर रहा है। डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, इंजीनियर का इंजीनियर और अध्यापक के बेटे को अध्यापक बनने में भले ही कोई दिक्कत न हो पर क्या किसान के बेटे को किसान बनने में ऐसी ही बात है। यदि जवाब ना में है तो फिर भाषण और किताबों में कृषि प्रधान देश होने पर गर्व क्यों! विदर्भ में हजारों किसानों की आत्महत्या, दिनों-दिन बढ़ते कर्ज, लगातार घाटे में जाती खेती-किसानी और सही समय पर उचित खाद-बीज तक न उपलब्ध करा देने वाली सरकारों की प्राथमिकता में यदि खेती का विकास होना होता तो देश में खेती की ऐसी हालत न होती।
आंकड़ों में देष की लगभग सत्तर प्रतिशत आबादी गांव में रहती है और इसमें ज्यादातर किसान हैं। आंकड़ों में कृषि प्रधान देष होने पर किसी को कोई शक नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय सेम्पल सर्वे के नतीजे खेती की बेहतरी के लिए किए जा रहे काम पर सवाल खड़े करने के लिए काफी हैं। इस सर्वे के मुताबिक 40 फीसदी किसान खेती नहीं करना चाहते। लगभग 27 फीसदी किसानों ने इसे घाटे का सौदा कहा और इसके अलावा 8 फीसदी किसान कहते हैं कि खेती जोखिम का काम है। कुल मिलाकर 75 फीसदी किसान किन्हीं न किन्हीं कारणों से खेती नहीं करना चाहते हैं।
2000-01 में प्रति व्यक्ति राज्य घरेलू उत्पाद मध्य प्रदेश में रु. 10803 था, जबकि पंजाब में यह रु. 25048 और हरियाणा में रु. 23742 था। 1999-2000 में आधिकारिक तौर पर मध्य प्रदेष में ग़रीबी का अनुपात 37.1 प्रतिषत था जबकि उसी वर्ष राष्ट्रीय स्तर पर यह अनुपात 27 प्रतिशत था। राष्ट्रीय मानव विकास प्रतिवेदन (2001) के अनुमान के अनुसार ग्रामीण मध्य प्रदेश में 2.2 करोड़ लोग अधिकारिक गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करते हैं। आदिवासी लोग, जो प्रदेश की आबादी का क़रीब 22 फ़ीसदी हिस्सा हैं, और भी गयी-गुजरी स्थितियों में जीवन यापन कर रहे हैं।
आज स्थिति यह है कि ग्रामीण परिवारों में लगभग साढ़े ग्यारह प्रतिशत के पास कोई कृषि भूमि नहीं है और साठ प्रतिशत से भी अधिक परिवारों के पास एक एकड़ से भी कम भूमि है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले दस सालों के दौरान देहात में प्रति परिवार औसतन लगभग सत्ताइस प्रतिषत कृषि भूमि घट गई है। तो सवाल यह उठता है कि आखिर जमीन जा कहां रही है। दरअसल बढ़ती आबादी के साथ तो खेती लगातार बंटवारे के बाद छोटे-छोटे हिस्सों में तब्दील हो रही है, लेकिन बड़ा कारण यह भी है कि खेती पर भी बड़ी कम्पनियों नजर जमाए बैठी हैं। उद्योग-धंधों के बाद बड़ी कम्पनियां अब सीधे तौर पर खेती के लिए आगे आ रही हैं। होशंगाबाद जिला इसका एक उदाहरण है, जहां कई बड़ी कम्पनियों ने अपने पैर जमाए हैं, वहीं इसी जिले में किसानों की आत्महत्याएं की खबरें भी आना शुरू हो गई हैं, जबकि होषंगाबाद जिला पानी के मामले में संपन्न कहा जाता है, और यहां तवा बांध बनने के बाद तथाकथित हरित क्रांति का नारा दिया जाता रहा है। इसके बावजूद कई गैर सरकारी संस्थाओं के अध्ययन बताते हैं कि यहां उत्पादन बढ़ने के साथ उत्पादन लागत में भी बेतहाषा वृदृिध हुई है। कई-कई साल प्राकृतिक आपदाओं की मार झेलने के बाद भी किसानों को किसी तरह के राहत देने में सरकारों को पसीने छूट जाते हैं, जबकि मंदी जैसी तथाकथित आपदाओं के लिए करोड़ों रूपए के पैकेज कम्पनियों के खाते में जारी कर दिए जाते हैं।

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