आसाराम ·े आश्रम में चार बच्चों ·ी मौतों ने खबरिया चैनलों ·ो अच्छा मसाला दे दिया। अलग-अलग एंगल से खबरें बनती रहीं, बि·ती रहीं। खबर, खबर है जाहिर तौर पर जनता ·े सामने आना चाहिए, पर क्या यह खबर यह है ·ि बच्चों ·ी संदिग्ध मौतें हुई हैं या फिर खबर यह है ·ि आसाराम ·े आश्रम में यह मौतें हुई हैं। दूसरी वाली बात से आप ज्यादा सहमत होंगे। सच्चाई तो यही है। असल में जनसरो·ारों से जुड़ी खबरें चाहे वह प्रिंट ·ा मामला हो या फिर सिनेमाई हो चली टीवी पत्र·ारिता ·ा, दोनों में ही इस तरह ·े मुद्दे तभी दिखाई देते हैं जब दूसरा वाला पक्ष ·हीं जा·र अट· जाता है। नहीं तो इस देश बच्चों ·ी आधी आबादी ·ो भरपेट भोजन नसीब नहीं हो रहा है, मप्र में तो यह संख्या साठ फीसदी त· पहुंच जाती है, ऐसे समाज में बच्चों ·ी खबरें सिर्फ इन्हीं मौ·े पर आना क्यों जरूरी नहीं है? पिछले साल बैगा जनजाति ·े नवजात शिशु संग्राम ·ी खबर ·रने मंडला जिला जाना हुआ था। इस शिशु ·ी मां प्रसव ·े दौरान ही अव्यवस्थाओं ·ा शि·ार हो मर चु·ी थी और संग्राम भी खासा जिंदगी से जूझ रहा था। इस खबर ·ो छपने से ज्यादा हम इस बात ·ो ले·र चिंतित थे ·ि ·िसी तरह प्रशासनि· अमला जाग जाए और संग्राम ·ो बचाने ·े सार्थ· प्रयास हो स·ें। वि·ास संवाद ·े सचिन भाई, स्वतंत्र पत्र·ार लो·ेन्द्र सिंह और उस समय दैनि· जागरण वाले दयाशं·र मिश्र हमारे साथ थे। तब चर्चाओं और तुरंत एक् शन ·े लिए सही यही लगा ·ि क्यों ना टीवी पत्र·ारों ·ी मदद ली जाए। भोपाल से ले·र राजदीप सरदेसाई से भी इस संबंध में बात ·ी। असर हुआ, दूसरे दिन जबलपुर से एनडीटीवी ·े साथी आए भी। हमने अपनी अन्य यात्राएं स्थगित ·र फिर से उसी फील्ड में दिन खपाया। तसल्ली भी हुई, ले·िन वही नहीं हो स·ा जिसे चाह रहे थे। संग्राम आसाराम ·े आश्रम ·ा बच्चा नहीं था, उस·ी आहें घने जंगल ·े बीच ए· बैगा टोले में गूंज रही थीं, गरीब था, ·ोई सेलेब्रिटी नहीं जुड़ी थी उस·े साथ, शायद इसीलिए वह चैनल ·ी प्रमुख खबर नहीं बन स·ा। अखबार में जरूर खबरें छपीं। पूरे मुद्दे पर ज्वाइंट ·मेटी भी नियुक्त हो गयी, ले·िन....·ुछ दिनों बाद मंडला से विवे· भाई ·ा फोन आया...संग्राम नहीं रहा।
नर्मदापुरम (होशंगाबाद) जिले के गांव हिरनखेड़ा में जन्म, जहां राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी ने गुरूकुल और स्वतंत्रता संग्राम की गुप्त गतिविधियों के केन्द्र ‘सेवा सदन’ की स्थापना की थी। स्कूल शिक्षा से ही संपादक के नाम पत्रलेखन से पत्रकारिता, लेखन और साहित्यिक, सामाजिक गतिविधियों में झुकाव।
1999 में गांव से ही साइक्लोस्टाइल त्रैमासिक बाल पत्रिका बालप्रयास शुरू की, चार साल तक इसका संपादन किया। शैक्षणिक संस्था ‘एकलव्य’ के साथ जुड़कर बालगतिविधि केन्द्र बालसमूह का 1996 से 2002 तक संचालन किया। ‘ग्राम सेवा समिति’ के साथ जुड़ाव व लेखन कार्यशालाओं में सक्रिय भागीदारी से सामाजिक मुद्दों पर लिखना सीखा। अपने आसपास के मुद्दों पर पत्रलेखन के माध्यम से मुहिम चलाई, इससे कई मुद्दों को हल भी किया गया। युवा पत्र लेखक मंच के सिवनी मालवा ब्लॉक अध्यक्ष का दायित्व निभाया।
2002 में पत्रकारिता में औपचारिक पढ़ाई के लिए माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि में दाखिला लिया, प्रथम श्रेणी में डिग्री हासिल की। 2004 से 2009 तक देशबंधु, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर व राजस्थान पत्रिका भोपाल में रिपोर्टिंग और डेस्क की जिम्मेदारी संभाली।
2012 से 2015 तक दैनिक भास्कर डॉट कॉम के छत्तीसगढ़ हायपर लोकल का लांच किया और तीन साल तक स्टेट हेड के रूप में काम किया। 2016 से 2019 तक एनडीटीवी में बतौर राइटर लेखन, जी न्यूज में 2019 से 2020 तक और 2020 से 2024 तक नेटवर्क 18 में बतौर राइटर लेखन किया।
वर्ष 2020 से देश की ख्यात पर्यावरण पत्रिका ‘डाउन टू अर्थ’ में कृषि, पर्यावरण, स्वास्थ्य, जनसरोकार के विषयों पर मध्यप्रदेश से ग्राउंड—रिसर्च बेस्ड स्टोरीज पर काम जारी।
समानांतर रूप से सामाजिक शोध संस्था ‘विकास संवाद’ के साथ जनसरोकार के मुद्दों पर जमीनी काम कर रहे हैं। जनसरोकारी पत्रकारिता के लिए सक्रिय रूप से संवाद कार्यक्रमों का समन्वय। अब तक 12 नेशनल मीडिया कान्क्लेव का सफल संयोजन। सामाजिक विषयों पर दस किताबों का संपादन। लेखन, सोशल मीडिया, डिजाइनिंग और फोटोग्राफी पर प्रशिक्षक की भूमिका का निर्वाह।
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कुछ प्रतिष्ठित फैलोशिप और अवार्ड
2020 - सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज फैलोशिप फॉर एफॉर्डेबल हाउसिंग, नई दिल्ली
2019- नेशनल वाटरएड फैलोशिप, नई दिल्ली
2019— गांधीयन ईको फिलॉसफी फैलोशिप, एप्को, मप्र
2017— रीच लिली टीबी मीडिया नेशनल अवार्ड, नई दिल्ली
2015— नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया का नेशनल अवार्ड
2014— एक्सीलेंस रिपोर्टिंग आन इम्युनाइजेशन अवार्ड, यूनीसेफ, नई दिल्ली
2011— रीच लिली टीबी मीडिया फैलोशिप, चैन्नई
2007— विकास संवाद मीडिया फैलोशिप के लिए भी चुना गया।
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