शुक्रवार, दिसंबर 24, 2010

बच्चों को सूचना का ' धिक्कार '

  
 ·         राकेश  कुमार मालवीय

महोदय यह सवाल देश  के उन करोड़ों बच्चों की तरफ से है कि आखिर उन्हें जानने का अधिकार क्यों नहीं है। उत्तरप्रदेश राज्य सूचना आयोग ने एक चौथी कक्षा की बालिका के आवेदन को जिस तरह से खारिज किया वह देश में बच्चों के अधिकारों को लेकर संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र का सीधा-सीधा मखौल उड़ाता नजर आता है। इस घोषणापत्र में जिन अधिकारों को लेकर हस्ताक्षर कर सहमति दी है उसमें बच्चों को सहभागिता का अधिकार भी दिया गया है। सीआरसी के अनुच्छेद तेरह के अंतर्गत यह साफ लिखा है कि बच्चों को सूचना पाने तथा उसमें सहभागी रहने, मिलने-जुलने, समूह या संगठन में शामिल होने का अधिकार है जब तक कि वह आपके लिए या किसी अन्य के लिए घातक न हो। यह अधिकार सुनिश्चित  करता है कि बच्चों को समाज में किसी भी तरह की प्रक्रियाओं में सहभागिता दी जानी चाहिए। इस घोषणापत्र के बरअक्स जब एक बालिका अपनी सामाजिक चेतना का प्रयोग करते हुए जानकारी चाहती है तो उसे ठुकरा दिया जाता है। यह मामला साफ करता है कि बच्चों के मामले में न केवल घर-परिवार-समाज बल्कि संवैधानिक संस्थाएं भी उस स्तर पर नहीं सोच पा रही हैं।

नौ साल की ऐष्वर्या संभवत: देश की सबसे छोटी आरटीआई एक्टिविस्ट हैं। केवल आरटीआई ही नहीं बच्चों के अधिकारों को लेकर इस बालिका ने देश में एक जरूरी बहस को पैदा किया है। बहस यह कि परिवार, समाज और देश  की संवैधानिक, राजनैतिक प्रक्रियाओं में बच्चों को आवश्यक  रूप से शामिल किया जाना चाहिए। सक्रिय भागीदारी हो भी तो आखिर किस तरह। और सिध्दांतत: यदि बच्चों के अधिकारों के प्रति हम वचनबध्द हैं तो व्यवहार में उन्हें कैसे लाया जाना चाहिए।

आज से 21 बरस पहले बच्चों के अधिकारों को लेकर हमने एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। 1989 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने बाल अधिकार घोषणापत्र जारी किया और भारत ने सन् 1992 में इस पर हस्ताक्षर किए थे। अंतराष्ट्रीय लोक अधिकार कानून के संदर्भ में बाल अधिकार समझौते को कानूनी रूप से लागू करना उन सभी देशों -सरकारों के लिये बंधनकारी है, जिन्होंने इसे स्वीकार किया है, परन्तु भारत में अब भी संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौते के तहत बाल अधिकारों को एक समग्र दृष्टिकोण में नहीं देखा जा रहा है। भारत में बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन के मामलों को न्यायालयीन व्यवस्था में कोई विशेष  स्थान नहीं है और नहीं यह सामाजिक न्याय व्यवस्था के हिस्से के रूप में परिभाषित होता है। मौजूदा न्याय व्यवस्था के लचरपन के संदर्भ में बात करें तो यह मान लेना होगा कि भारत में बच्चे अब भी न्याय से दूर हैं।

बच्चों  के अधिकारों के पैरवीकार इस बात के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं कि बड़ों की दुनिया में बच्चों की बात भी सुनी जानी चाहिए। कमोबश बाल अधिकारों के लिए लिखित सहमति के बावजूद तमाम देषों की सरकारें ऐसी लोकप्रिय व्यवस्था नहीं बना पाई नीति-निर्माण से लेकर तमाम योजनागत व्यवस्थाओं में बच्चों से सलाह-मशविरा लिया गया हो, ऐसे मौके कम हीं आए हैं। यह स्थिति वाकई कितनी अन्यायपूर्ण है कि हम टीवी शोज में तबला बजाने से लेकर नाचने-गाने और जहान में छा जाने की अपेक्षा रखते हैं, लेकिन वैचारिक संदर्भों में हम बच्चों की दखल, उनके विचार और उनकी राय को अब तक नहीं समझ पाए हैं। केवल सरकार के स्तर पर ही नहीं परिवार में भी बच्चों की अभिव्यक्ति के मौके की गुंजाइश बेहद कमतर आंकी जाती है। बच्चों की हाजिरजवाबी के लिए उन्हें दाद तो मिल सकती है, लेकिन उनकी किसी राय को माने-जाने की संभावना उससे बहुत कम है। प्रसिध्द षिक्षा शास्त्री प्रोफेसर यशपाल  का भी मानना है कि बच्चों के सवालों पर उतना ही गौर करने की जरूरत है जितना किसी अन्य के। बावजूद इसके उन्हें उतना ही कम स्थान दिया जाता है। सोचने की बात यह भी है कि स्कूली व्यवस्था में ऐसे अवसरों को हम कॉरपोरल पनिशमेंट के रूप में परिभाषित करते हैं, लेकिन यही स्थिति जब घर में बनती है तो उसे हम कुछ नहीं कहते।

देश में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां विकास प्रक्रियाओं में बच्चों को भागीदारी दी गई हो वहां उन्होंने बड़ों की तरह ही बेहतर काम के उदाहरण पेश  किए हैं। मध्यप्रदेश के देवास जिलों में बाल पंचायतें स्थापित की गईं। यहां बच्चे पंच-सरपंच के रूप में सामने आए और उन्होंने  कई मामलों को हल करके अपना लोहा मनवाया। होशंगाबाद  जिले के सोलह अलग-अलग गांवों में बच्चों ने बालसमूह बनाकर लाइब्रेरी चलाने से लेकर पत्रिकाएं निकालने तक का उदाहरण पेश  किया। गुना जिले के कुछ स्कूलों के बच्चे जगमग अखबार निकाल रहे हैं। यह कुछ एक उदाहरण मात्र हैं, लेकिन इतना बताने के लिए काफी हैं कि बड़ों की दुनिया में बच्चों का अपना दखल है। उनकी क्षमताएं हैं। इसके बावजूद संवैधानिक स्तर पर उन्हें अपने अधिकारों से वंचित रखा जाता है तो निश्चित  ही यह हमारी सरकार के दो चेहरे उजागर करता है। यह बताता है कि बच्चों की स्थिति देश में सबसे खराब है और इसी बीच यदि बच्चों की तरफ से कोई आवाज निकलकर आती है तो उसे शाबासी देने के बजाए हम गला दबा देने काम कर रहे हैं। यदि बच्चे समाज की मुख्यधारा में होते तो क्या सूचना का अधिकार का उपयोग करने पर उसे पुरस्कृत करने के बजाए ऐसा आदेश  दिया जाता। यह भी तब जबकि देश के सूचना के अधिकार कानून में उम्र को लेकर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। इसमें कहा गया है कि हर भारतीय नागरिक को सूचनाएं पाने का अधिकार है। क्या बच्चे देश के  नागरिक नहीं हैं।


कोई टिप्पणी नहीं: