शुक्रवार, अगस्त 27, 2010

राह दिखाती आंगनवाड़ी

Photo: Gagan Nayar. 
राकेश कुमार मालवीय

यहां आंगनवाड़ी का मतलब एक भवन भर नहीं है। न ही दरिया बांट देने से काम पूरा हो जाता है। यहां बच्चों को मजा आता है। वे गीत गाते हैं, अभिनय करते हैं, उछलते हैं, बातें करते हैं, सीखते हैं, लिखते हैं और मजे से पढ़ते हैं। मजा आता है, इसलिए बच्चे हर रोज उत्साह के साथ आते हैं। इस आंगनवाड़ी की कोशिशों  ने गांव में बच्चों की सेहत की तस्वीर तो बदली है, यह प्रदेश के दूसरे गांवों को भी रास्ता बताती है। मध्यप्रदेश के खंडवा जिले के अम्बाडा गांव की आंगनवाड़ी प्रदेश के माथे से कुपोषण का कलंक दूर करने का रास्ता बताती है। यह काम किसी जादुई डंडे से नहीं हो गया, यह स्थानीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भागीरथी सोनी की लगातार कोशिशों का परिणाम है।

          मप्र की राजधानी भोपाल से लगभग 300 किलोमीटर दूर खंडवा जिले का खालवा ब्लॉक कुपोषण के मामले में बदनाम है। यहां की चालीस प्रतिशत  आबादी आदिवासी और दलित समुदाय से आती है। यह ब्लॉक पांचवी अनुसूची के अंतर्गत अधिसूचित घोषित किया गया है। खालवा ब्लॉक में कोरकू आदिवासियों की संख्या अधिक है। इसी ब्लॉक के एक दर्जन गांव में पिछले साल तीन माह के दौरान साठ बच्चों की मौत दर्ज हुई थी। यह मौतें तो सामने आ गई थीं पर सच्चाई यह है किं पूरे ब्लॉक की स्थिति बेहद खराब है। यहां लोगों के सामने जीवनयापन के सवाल परम्परागत व्यवस्थाएं खत्म होने के साथ खड़े हो गए हैं। यही कारण हैं कि इस पूरे इलाके में मानवीय विकास के सूचकांक कमजोर नजर आते हैं। पिछले दो दषकों के दौरान इस इलाके में बच्चों और महिलाओं का स्वास्थ्य हाशिये  पर चला गया है, लेकिन इन्हीं दो दशकों  में अम्बाड़ा गांव के आंगनवाड़ी सेंटर ने एक अनूठी इबारत लिखी है।
    
 जब भारत में जब उदारीकरण, बाजारीकरण और भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने रफ्तार पकड़नी शुरू की थी ठीक उसी दौर में खालवा ब्लॉक के छोटे से गांव अम्बाडा में भी एक आंगनवाड़ी की आधारशिला  रखी गई। भागवती सोनी को आंगनवाड़ी सेंटर चलाने की जिम्मेदारी मिली और उन्होंने इसे कैसे चलाया जाता है इसकी एक छोटी सी ट्रेनिंग इंदौर में ली। पहले आंगनवाड़ी चलाने के लिए इतनी सुविधाएं भी नहीं थी, न सामान था और न ही बजट। यह उनकी रूचि और सामाजिक दायित्वों के प्रति आग्रह ही था कि घर के आंगन से ही व्यक्तिगत संसाधनों के साथ सामाजिक सरोकारों की मुहिम पर निकल पड़ीं। गांव का सहयोग भी मिला। खाने-पीने का सामान और एक तेल का डिब्बा भर मिला करता था पर इसी से वह देश के कठिनतम इलाके में मुहिम को अंजाम देने जा रही थीं। रोज आंगनवाड़ी लगा करती और बच्चे हर रोज नई-नई चीजों को सीखते। इस कारवां को चलते-चलते आज लगभग दो दशक  हो गए।

अब भी उसी गति से बल्कि उससे ज्यादा बेहतर तरीके से आंगनवाड़ी चला करती है। अब इस आंगनवाड़ी में 0 से 6 साल के 118 बच्चे रजिस्टर्ड हैं। इनमें तीन बच्चे ही गंभीर रूप से कुपोषित हैं। भागवती बताती हैं कि नए नियमों के मुताबिक हालांकि यह संख्या बढ़ गई है। अब यहां 8 बच्चे अतिकुपोषित और 39 बच्चे मध्यम दर्जे में आ गए हैं। यह संख्या बढ़ी लग सकती हैं, लेकिन जिस इलाके में आजीविका के संकट गंभीर रूप से खड़े हों वहां जड़ से कुपोषण दूर कर देना केवल एक आंगनवाड़ी के बस की बात नहीं है। फिर भी अम्बाड़ा गांव में कुपोषित बच्चों का आंकड़ा मप्र के कुल आंकड़े से कम है। 

Photo: Gagan Nayar
अम्बाड़ा गांव की यह आंगनवाड़ी सुबह 9 बजे शुरू हो जाती है। सबसे पहले साफ सफाई का पाठ और फिर प्रार्थना। फिर शुरू हो जाता है अक्षर, वर्णमाला और पढ़ाई का दौर। पढ़ाई के बाद हर दिन अलग-अलग मीनू के हिसाब से भोजन। भोजन बनाने और बच्चों को आंगनवाड़ी में लाने और साफ सपफाई में मदद करती हैं नसीम बाने। नसीम बानो यहां आंगनवाड़ी सहायिका हैं। वह भागवती सोनी के साथ आंगनवाड़ी की शुरूआत से ही हैं।

मोटर चलाओ भाई मोटर चलाओ, कूकू भाई जंगल में रहता है सरीखे गीतों में बच्चों को मजा तो आता ही है उनका ज्ञान भी बढ़ता है। इसलिए यहां बच्चों को आंगनवाड़ी आने में अच्छा लगता है। दूसरे इलाकों में जहां आंगनवाड़ी को केवल दरिया वितरण केन्द्र कहा जाता हो वहीं ऐसे आदिवासी इलाकों में अम्बाड़ा की यह आंगनवाड़ी नई रौशनी  देती नजर आती है। गांव के लोगों का भी आंगनवाड़ी को अच्छा सहयोग रहता है। गर्भधात्री माताओं के लिए भी यहां से पोषणआहार, टीकाकरण आदि की सुविधाएं मिलती हैं। भागवती सोनी बताती हैं कि बच्चे तो उन्हें आंगनवाड़ी आते देखकर खुद ही आ जाते हैं। वह कहती हैं कि उन्हें खुद कोरकू बोली आती है इसलिए इन कोरकू बच्चों के साथ वह उसी भाषा में ज्यादा बेहतर तरीकों से सिखा पाती हैं। हालांकि शुरूआत में लोगों को समझाने में काफी दिक्कतें आती थीं, लेकिन अब वह समझने लगे हैं।

 इस क्षेत्र में काम कर रही स्पंदन संस्था ने भी आंगनवाड़ी को रोचक बनाने में सहयोग किया है। स्पंदन की सीमा प्रकाश कहती हैं खालवा ब्लॉक आदिवासी बाहुल्य है और यहां बच्चों की स्थिति बेहद खराब है। उन्होंने इस क्षेत्र की आंगनवाड़ियों को बेहतर बनाने के लिए खेल-खिलौने आदि की मदद भी की है, इसलिए यहां केवल भवन भर नहीं है।

कोई टिप्पणी नहीं: