गुरुवार, जनवरी 13, 2011

शहर कोई विकल्प नहीं छोड़ता है

शहर कोई विकल्प नहीं छोड़ता है
दूर से नज़र आती चकाचौंध  रौशनी के पीछे
वह छिपाए रहता है 
नाउम्मीदी का अँधेरा,
कल तक जो भरते थे हमारे अनाज के भंडार,
वे आज खड़े होकर पंक्तियों में करते हैं
राम रोटी योजना में बंटती  छः रोटियों का इंतज़ार,
उत्सवों से भरे हमारे समाज में
वे ही हैं जो भूल चुके हैं कब आती है
आतिशबाजी-दीपकों के रोशन होने की तारीख,
वे जो बनाते हैं महलमंदिर और मस्जिद
अब उन्हें नहीं है हक़ भाग्य के भरोसे रह जाने का भी,
हर बार बसने की कोशिश करते हैं वे
और विकास के एक बुलडोज़र से
उजाड़ दी जाती है उनकी वह उम्मीद भी,
जो देते हैं गगनचुम्बी इमारतों को आकार
उनसे ही यह शहर पूछता है
क्या है तुम्हारा ठिकाना?
क्यों है तुम्हे चिट्ठी का इंतज़ार?
मुद्रा हो या सम्मान
बेठिकाने - बेआसरे रहते इन लोगों को
चुकानी पड़ती है सबसे ज्यादा कीमत हर रोज़,
शहर कोई विकल्प नहीं छोड़ता है,
कचरे का ढेर बन जाता है
उनकी सेज भी और तकिया भी,
शहर की गंदगी के बीच बहता है उनके हक़ का पानी,
स्कूल को दूर से एक नज़र  निहार कर  
वे बढ़ जाते हैं
आज की रात एक ठिकाने की तलाश में,
कैसे करोगे तुम इस बात से इनकार
तुम्हारी इमारत की नीव में पत्थर नहीं
गढ़ी हैं उनकी लाशें जो ठण्ड की ठिठुरन 
और लू में जल कर हार गए जिन्दगी की लड़ाई,
वे मौत से नहीं लड़े थे
बस लड़ते रहे तुम्हारी ना ख़तम होने वाली 
बड़े बड़े ढाँचे बनाने वाली प्रवृत्ति  से,
एक वक़्त आने को है
जब तुम्हारे लिए भी नहीं छोड़ेगा
कोई विकल्प यह शहर,
तुम्हे छोड़ देगा झूठे दंभ के
सबसे ऊँचे तल पर ले जाकर अकेला
नहीं तो दफना देगा फरेब की गहराईओं में
और ले जाएगा दम घोटने वाली हवाओं के बीच
शहर कोई विकल्प नहीं छोड़ता है किसी के लिए !!!
 - सचिन कुमार जैन  

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