सोमवार, जनवरी 10, 2011

सोने के दांतों को निवाला नहीं

बरगी बांध
बींझा निवासी सत्तर साल के  गोपाल उइके और सुखराम आदिवासी के दांतों में लगी सोने की कील बताती है कि वह भी कभी समृद्ध थे। दोनों बुजुर्गों के पास अब सोने का एक भी आभूषण नहीं है। उनके बेटों के लिए सोना तो क्या अब रोटी का भी संकट है। कलोरी गांव के करोड़ी पटेल भी कभी 56 एकड़ जमीन के मालिक थे। उनके घर लगभग तीस गाय, बैल और भैंस भी थे। उनका परिवार शाकाहारी था। अब वे मछुआ समिति के अध्यक्ष हैं। खुद मछली नहीं खाते पर इसके कारोबार के लिए जरूर मजबूर हो गए। उनके घर की दीवार पर लिखा है कि अब वह गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं।

घर के आगे लिखा बीपीएल  
यह कहानी कोई एक दो लोग या गांव की नहीं है। 162 गांव के हर घर-परिवार में ऐसी दुखद गाथाएं विकास को मुंह चिढ़ा रही हैं। विकास के लिए इस विनाश  की इबारत चार दशक  पहले लिखी गई थी जब नर्मदा नदी पर बरगी बांध योजना को आकार दिया गया था। इसे विस्थापन की सबसे बड़ी त्रासदी कहा जा सकती है। यहां लोगों को बिना किसी बेहतर पुनर्वास के अपने घरों से बेदखल कर दिया गया। इन गांवों के वाशिंदे  अब भी इस बलिदान की कीमत चुका रहे हैं।

गौरतलब है कि नर्मदा घाटी विकास परियोजना के अंतर्गत 1312 किमी लंबी नर्मदा पर तीस बड़े, 56 छोटे और 250 लघु आकार के बांध बनाए जा रहे हैं। इस श्रंखला का सबसे पहला बांध नर्मदा की सहायक नदी तवा पर बना। दूसरा बांध जबलपुर जिले में नर्मदा नदी पर ही बनाया गया। रानी अवंतीबाई सागर परियोजना के नाम से बनाए गए इस बांध की चौड़ाई लगभग पांच किमी है तथा उंचाई 69 मीटर है। केन्द्रीय जल और उर्जा आयोग ने इस बांध के निर्माण का खाका तैयार किया था। इसके अंतर्गत 2980 वर्ग किमी क्षेत्र में सिंचाई और 105 मेगावाट विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था। बाद में इसका सिंचाई क्षेत्र बढ़ाकर 4370 वर्ग किमी कर दिया गया। इस बांध का निर्माण 1974 में शुरू हुआ और 1990 में यह पूरी तरह बनकर तैयार हो सका। इसी साल इस बांध को पूरी क्षमता के साथ भरा गया। इसका जलाशय  75 किमी लंबा और साढ़े चार किमी चौड़ा है। इस तरह यह 267 वर्ग किमी में इसका विस्तार है। यह जबलपुर, मंडला और सिवनी जिले की सीमाओं को छूता है। बरगी बांध बनने से 162 गांव डूब में आए।

गोपाल उइके
डूब प्रभावित गांव बींझा के गोपाल उइके ने बताया कि बांध बनने से पहले उन्हें तकलीफ नहीं थी। घर में खूब घी-दूध होता था। खेतों में धान, कोंदो-कुटकी, ज्वार, बाजारा, दाल-मसाले, गेहूं-चना पैदा हो जाता था। हर चीज के लिए बाजार नहीं जाना होता था। धन-दौलत थी। बांध बना और उन्हें यहां आना पड़ा। आठ एकड़ जमीन का केवल 9000 रूपए मुआवजा मिला। अब दो किलो अनाज से परेशान हैं। बींझा गांव के 85 परिवारों की यही हालत है।  सुखराम आदिवासी की भी 18 एकड़ जमीन का केवल 25 हजार रूप्ए मुआवजा मिला। सुखराम बताते हैं कि बांध बनाते समय सरकार ने वायदा किया था कि उन्हें यहां से जाने के बाद पांच एकड़ जमीन और परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाएगी। पर ऐसा आज तक नहीं हो सका।

इन गांवों का अस्तित्व ही नहीं :

बरगी बांध से उजड़े 11 गांव का अस्तित्व ही नहीं है। इन गांवों में सरकार की सारी योजनाएं लागू हैं, लेकिन जब रिकॉर्ड की बात आती है तो न इन्हें राजस्व ग्राम माना जाता है और न ही वन ग्राम। यह गांव वीरान गांव की श्रेणी में हैं। गावंदा, मिर्की, कठौतिया, मगरधा, बडैयाखेड़ा, बींझा, खामखेड़ा, भुल्लापाठ, तुनिया, खमड़िया, हददुली गांव के लोग केवल दस्तावेज की इस पेचींदगी के कारण महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। इन गांवों में लोगों को जॉब कार्ड तो मिले, लेकिन अब तक एक भी दिन का काम नसीब नहीं हुआ है। तुनिया ग्राम पंचायत के सरपंच सुक्कू पटेल  ने बताया कि खाते में तीन लाख रूपए जमा होने के बावजूद वह काम नहीं खोल पा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि यह राजस्व ग्राम हो जाएंगे तो बहुत काम निकल आएगा।  

टापू पर बसे तीन गांव :

कठोतिया गाँव 
बरगी जलाशय  से लगभग दस किमी की दूरी पर बसे हैं गांव कठौतिया, बरैयाखेड़ा और मिर्सी। यह जलाशय में टापू पर बसे गांव हैं। तीन ओर से पानी है एक और से जंगल। इन तीनों गांव में आने-जाने का केवल एक ही रास्ता है जलमार्ग। चाहे सार्वजनिक वितरण प्रणाली का राशन  लाना हो या मजदूरी। इसके अलावा कोई चारा नहीं। इसके लिए हर यात्रा के बाद बीस रूपए चुकाने होते हैं। यहां गांवों में मनरेगा के जॉब कार्ड तो बने, लेकिन काम एक दिन भी नहीं हो पाया। न बेरोजगारी भत्ता ही मिला। यहां पर आजीविका का कोई साधन नहीं होने से लोग बाहर मजदूरी करने जाने को विवश  हैं। बच्चों की पढ़ाई अलग प्रभावित हो रही है। बड़ैयाखेड़ा के विद्यार्थियों की पढ़ाई आठवी कक्षा के बाद नहीं हो पाती। युवाओं के पास मछली पकड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। यहां के लड़कों की शादी नहीं हो पा रही। अब गांव के लोग आपस में  ही शादी कर रहे हैं। पिछले दिनों ही यहां सीमा और देवीप्रसाद की शादी हुई।

वायदा नहीं हुआ पूरा :

बांध प्रभावित क्षेत्र में डूब की खेती कुछ सहारा देती है। सरकार ने दस साल पहले बांध प्रभावित लोगों के आंदोलन के बाद यह मौखिक वायदा किया था कि हर साल 15 दिसम्बर तक बांध का जलस्तर 418 मीटर के जलस्तर तक कर दिया जाएगा। लेकिन इस साल 20 दिसम्बर तक भी बांध का जलस्तर 421 मीटर के जलस्तर तक भरा हुआ है। बरगी बांध विस्थापित संघ के राजकुमार सिन्हा कहते हैं कि यह लोगों के साथ सरासर धोखा है। अब जबकि बरगी के नजदीक ही चुटका में परमाणु बिजली संयंत्र स्थापित किया जा रहा है और वहां के लिए भी पानी की सप्लाई बरगी से ही की जाएगी तब यह कहना मुश्किल  है कि सरकार अपने वायदे को निभा पाएगी।

नहर ने किया खेतों को बर्बाद :

दिलीप पटेल
 1990 में बांध के पूरा हो जाने के बीस साल बाद नहरों का काम पूरा हो सका है। बरगी के दायीं तट शाखा में दो साल पहले पानी छोड़ा गया। नहर निर्माण में तकनीकी खामियों के चलते कई गांवों की सैकड़ों एकड़ जमीन में पानी का रिसाव हो रहा है। जमीन दलदली हो रही है। पिछले तीन सालों से अपने खेतों में किसान फसल ही नहीं ले पा रहे हैं। सगड़ा ग्राम पंचायत के किसान कल्लू सिंह पटेल, पिछले तीन सालों से कोई फसल नहीं ले पाए हैं। इसका कोई मुआवजा भी उन्हें नहीं मिला है। दिलीप कुमार पटेल बीस एकड़ के किसान हैं। उनके आठ एकड़ खेत में पानी है और खेत के बीचोंबीच से नाली निकाल दी गई है। उनके  यहां के पूर्व सरपंच आशीष  पांडे ने बताया कि नहर के किनारे बनाई गई ड्रेनेज को सही तरीके से नहीं बनाने से यह हालात बने हैं।

मछली का भी हक नहीं :

इस बांध से विस्थापित लोगों को मछली पकड़ने का हक भी नहीं है। दरअसल इस जलाशय में मछली उत्पादन अब ठेकेदार के हवाले है। मत्स्य समितियों के माध्यम से यह मछली 18 रूपए किलो के भाव से ही बिक पाती है। बाजार में इसका भाव औसतन साठ रूपए किलो होता है।

 राकेश मालवीय

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