सोमवार, जून 28, 2010

हे धृतराष्ट्र



हे धृतराष्ट्र

क्या धृतराष्ट्र होना ही तुम्हारी नियति है।
या कभी
खोलोगे भी आंखें
सच  तो यही है राजन
कि बेहद जरूरी है अब
आंखों पर चढ़ी पट्टी हटाना
जान लो यह सच्चाई
कि अब संजय पर नहीं कर सकते विश्वास
मान लो अब
कि सदियों से तुम्हारे अंधियारे ने
कितने'-कितने महाभारत खड़े किए
कितने-कितने योद्धा मारे गए
कितनी-कितनी विधवा मां और वधुएं
अब तक कर रही हैं प्रलाप
पर तुम हो कि अब भी
बने हुए हो
धृतराष्ट्र के धृतराष्ट्र।

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सोच रहे थे कि
अपने-आप खुल जाएंगी हथकड़ियां
पहरेदार सो जाएंगे
और जमुना जल से पार होते हुए
तुम पहुंच जाओगे उस पार
सुरक्षित हाथों में
पर
कितनी रातें गुजर गईं
नहीं खुल पा रही हथकड़ियां
चटक नहीं रहे ताले
अजीब इत्तेफाक है कि
खुफिया नेत्रों के भय से
सो  नहीं रहे हैं पहरेदार
कारागार में बंद है तारणहार
और
पार्श्व  में गूंज रहा है
एक भयानक अट्टाहास।
राकेश मालवीय

1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा!