टिकर

5/recent/ticker-posts

थोड़ी देर हो जाती तो नाले में पड़े—पड़े चली जाती गाय की जान

 


आज सुबह घूमने निकले तो एक नाले में गाय गिरी पड़ी थी। पेट फूल चुका था। बस अच्छा यह था कि पानी कम था और गाय के नथुने पानी से बाहर थे, जिससे उसकी सांसें चल पा रही थीं। कीचड़ में घपी हुई गाय ने निकलने की भरसक कोशिश तो कर ही ली थी। उसकी आंखों की बेबसी हृदय के अंदर तक गढ़ गई। पर मदद करें भी तो कैसे। थोड़ा आगे एक दूध डेयरी है, सोचा वहां कोई मदद मिल जाएगी, अकेले तो कुछ किया नहीं जा सकता था। वहां पहुंचे तो पता चला कि एक व्यक्ति नगर निगम को सुबह छह बजे फोन कर चुके थे, पर एक घंटे बाद भी कोई खबर नहीं थी। इतवार का दिन और इतनी सुबह मदद को आता तब तक गाय बचती या न बचती। 

वापस नाले के पास आए, करे तो क्या करे। गांव याद आया वहां यह स्थिति होती तो दस मिनट में पंद्रह लड़के खड़े हो जाते। मोहल्ले के ग्रुप पर मदद के लिए मैसेज डाला। दो चार उन लोगों को फोन किया जो गाय बचाने वाली विचारधारा से जुड़े हैं। इतने में वहीं सज्जन वहां पहुंचे जिन्होंने नगर निगम की गाड़ी को फोन किया था। मैं भी कोशिश कर रहा था कुछ हो जाए, कोई ऐसा संपर्क मिले जो तुरंत मदद पहुंचाए। खुद नाले में उतरकर कोशिश करने का सोचा, लेकिन समस्या के आगे मेरी ताकत बहुत सीमित थी। हमारे पास न रस्सी थी न दूसरा कोई सामान। इस बीच दर्शकों की संख्या बढ़ रही थी। ज्यादातर वे थे जो अपने—अपने डिब्बों में दूध ले जा रहे थे, दो चार वे थे जो गाय के दूध के व्यापारी थे, गाय के दूध से उनका घरबार चल रहा होगा। दो चार सेहत बनाने वाले लोग थे, जो मॉर्निंग वॉक के बाद दूध से अपने शरीर को मजबूत बनाने होंगे। पर नाले में पड़ी उस गाय को बचाना उनके एजेंडे में नहीं था।  

कुछ देर में नगर निगम की गाड़ी से फोन आया वे पता पूछ रहे थे। थोड़ी राहत मिली। गाड़ी आई पर उनके पास दो रस्सी के अलावा कुछ और नहीं था। तीन युवा साथी थे। स्थिति को देखा समझा, तीन में से दो मोर्चें पर आए, तीसरे की डयूटी वीडियो बनाने की थी, शायद उसे अपने अधिकारी को भेजना होगा। 

हम दो लोग भी नीचे उतरे। सींग से रस्सी बांधी। खींचा। एक दो साथी और आए। किसी ने पूंछ पकड़ी, किसी ने पैर, किसी ने सींग पकड़कर खींच लिया। आखिर टीमवर्क से गाय की जान बची और उसे गाड़ी में चढ़ाकर पशु चिकित्सालय की ओर रवाना किया। नगर निगम के उन साथियों को सलाम, जो इतनी सुबह देर से ही सही, पर आए और गाय की जान बच सकी। नहीं आए तो वह जो खूब जोर की आवाज में दिन और रात गाय—गाय चिल्लाते हैं।

ऐसे लोगों से अपील है जो शहर में अपनी गायों को आवारा छोड़ देते हैं। जब तक गाय दूध देती है तब तक उसे खूब दुहते हैं और ​जब काम की नहीं होती तो उसे आवारा छोड़ देते हैं। 

इस आपरेशन का वीडियो आप देख नीचे देख सकते हैं। 




एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ