शनिवार, मई 11, 2019

मतदान लाइव: पुलिसवाले मानवता कह रहे थे, और रौब दिखाता कलेक्टर रैंक का आदमी


टोल कर दीजिए कि हमारी कई कारणों से मतदान में रुचि नहीं रही हैं। 2014 से पहले से लगता रहा कि कुछ आधा—अधूरा है। यह भी लगता रहा कि विकल्प क्या है। यह भी लगता रहा कि जिसे बैठाते हैं वह जनपक्षीय न होते हुए कुछ और ही नीतियों पर चलता है, उसके केन्द्र में सबसे गरीब आदमी नहीं होता। फिर लगता था कि सौ में से साठ लोगों के दवारा चुनी हुई सरकार है।
फिर पत्रकार बन गए तो निष्पक्षता का भूत चढ़ गया। पंचायत चुनावों में तो खूब रुचि रहती, लेकिन दलीय राजनीति में एक किस्म का पशोपेश था कि पत्रकार वोट डालेगा तो उसे तो किसी का पक्ष लेना ही पड़ेगा।

इधर जब 2019 में देश एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया जिसे आने वाले पचास सालों का भविष्य बताया जाने लगा तो लगा कि एक सभ्य नागरिक के रूप में मतदान करना चाहिए, भले ही किसी का पक्ष लेना पड़े। हालांकि जिस पार्टी की ओर अपना सबसे अधिक स्वाभाविक झुकाव बिना कोई किताब पढ़े, सिद्धांत जाने रहा है, वहां से कोई उम्मीदवार ही नहीं है, इसे हमारी असफलता मानने में कोई शर्म नहीं है। लेकिन जब भोपाल का सीन कुछ अदृभुत बन गया तो तय हो ही गया कि वोट करना ही है। किसे, आप समझते रहिए।

तो साहब आज जब साढ़े सात बजे मतदान करने पहुंचे तो वहां राहुल भैया मिल गए। उन्होंने बताया कि वह साढ़े छह बजे लाइन में लग गए थे। तीसरा नंबर था और एक घंटा लग गया मतदान करने में। मशीन चालू नहीं हो पाई, और कोई कर्मचारी प्र​शिक्षित ही नहीं। लाइन लंबी होती गई और मोहल्ले के कई सारे लोग मिल गए। अच्छा लग रहा था, इतने सारे लोग एक साथ मिल ही नहीं पाते। मैं लाइन में खड़े चेहरों को बारी—बारी से देखता, कि किसके मन में क्या चल रहा होगा। आखिर कौन किसे वोट देे जा रहा होगा। वहां पर दो मटके रखे हुए थे, लेकिन पीने के लिए कोई मग्गा या गिलास ही नहीं था। मैंने फोटो टवीट करी। थोड़ी देर बाद कोई मग्गा रख गया। मेडम ने बताया कि टवीट का असर देखो। मैंने कहा अरे छोड़ो, इतनी जल्दी कोई असर थोड़ी होता है। कोई रख गया होगा। अभी अखबार में काम कर रहा होता तो फट से इम्पेक्ट न्यूज बना देता।

कुछ देर बाद लाइन सरकना शुरू हुई। धीरे—धीरे आगे बढ़ती गई। लाइन में सभी लगे थे। एक सज्जन ने पुलिसवालों पर चिल्लाना शुरू किया। बोले आप नियम से नहीं कर रहे। दो लाइन नहीं लगाई जा सकती। दरअसल आजू—बाजू में कमरा होने से वहां पर दो लाइनें साथ लगाना मजबूरी थी। वह व्यक्ति लगातार पुलिसवालों से झगड़ने लगा। पुलिसवाले ने शालीनता से कहा सर दूसरी तरफ गेट नहीं है। रौबदार आदमी ने कहा कि दीवाल तुड़वा दो। दीवाल तुड़वा कर गेट बनवाना था। आपको कुछ पता नहीं है। कुछ देर बाद एक बुजुर्ग की तबियत ठीक नहीं थी, तो उसे लाइन में आगे कर दिया। उसके बाद फिर उसने रौब झाड़ा। बोला ऐसा कोई नियम नहीं है, कहां लिखा है बताओ। वह पुलिसवालों से नियम मांगने लगा।

लाइन से चलाईये। पुलिस वाले और एक स्टार पुलिस वाली ने मुस्कूराकर जी कहा। पुलिसवाली बोली सर कोई बुजुर्ग हो तो उसे तो पहले ही कर सकते हैं न। आदमी ने रौबदार आवाज में कहा ऐसा कोई नियम नहीं है। पुलिसवाली ने कहा सर, कोई बुजुगों से नहीं बन रहा होगा या किसी का छोटा बेबी होगा तो उसको तो पहले करना पड़ेगा न सर। रौबदार आदमी ने बोला नहीं ऐसा कोई नियम नहीं है। पुलिसवाली ने कहा सर मानवता के नाते तो कर सकते हैं। रौबदार आदमी ने कहा कि नहीं, कोई मानवता वानवता नहीं। यह सुनने के बाद पुलिसवाली ने सिर नीचे कर लिया। वह मतदान कक्ष के अंदर चली गई। पुलिसवाले को इशारा किया, अंदर बुलाया। उसके कान में कुछ कहा। क्या, मैं समझ नहीं पाया।

मतदान करते लौटते एक आदमी ने पुलिसवाले को बताया ये कलेक्टर रैंक के आदमी हैं, इनको नियम मत बताओ। यह जानकारी देने वाला उनका पडोसी रहा होगा।

मैंने यह सुनकर कलेक्टर रैंक के आदमी की ओर देखा। उसका मुंह देखा, समझ नहीं आया कि कलेक्टर आदमी होता है या नहीं। क्या उसमें आदमियत होती होगी या वह केवल नियमदार आदमी ही होगा। अपना तो ज्यादा पाला पड़ता नहीं और जिनसे पड़ा वह अच्छे ही अधिकारी निकले। जाने यह कैसा रौबदार कलेक्टर था। सोचा तो लगा कि इसे शायद लाइन में खड़े होने की आदत नहीं रही होगी। आज खड़े होना पड़ा तो खीज गया। खीज बेचारे नए—नवेले पुलिसवालों पर निकाल रहा जो यह कह रहे थे कि सर हम तो आप लोगों की सेवा के लिए खड़े हैं, व्यवस्था करना हमारा काम नहीं है।

अचानक जेहन में शब्द गूंजा राष्टवाद। इस चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा तो यही रहा। फिर यह कैसा राष्टवाद कि केवल लाइन में खड़े होने की जेहमत नहीं उठा सकते एक घंटे। कैसे हम पाकिस्तान को नेस्तेनाबूत कर देने का नारा बैठे—ठाले लगा देते है, जबकि देश के लोकतंत्र के लिए लाइन में आधा घंटा खड़े नहीं हो सकते। उन बेचारे पु​लिसवालों का क्या दोष है। मतदान पूरा कराना उनका भी काम है या इसमें हमारी भी कोई भूमिका हो सकती है। यदि कोई स्थिति बिगड़ भी गई तो क्या हमारा कर्तव्य नहीं है कि प्रशासन को सहयोग कर दें। या हम नियम दिखाएंगे। क्या हमारी देशभक्ति फेसबुक पर फोटो डालने भर से है, या पाकिस्तान को गाली देने भर से है या मोदीजी को सबसे बड़ा देशभक्त बताने भर से है।

सोचिएगा इस लोकतंत्र में हमारी भूमिका क्या है। मैं भी देखने के अलावा और कुछ नहीं कर सका। मेरा चुप रहकर लाइन में खड़े होकर धैर्य से मतदान में सहयोग करना ही मेरी भूमिका है। हम चुप रहकर भी देशभक्त रह सकते हैं, कोई दिखावे की जरूरत नहीं है, हमारे दिल में हमारा हिंदुस्तान है, हमारे सपनों का हिंदुस्तान है, एक बराबरी का जहान है। 

खतरनाक ‘सफाया’

होशंगाबाद (मध्यप्रदेश) से राकेश कुमार मालवीय होशंगाबाद जिले के गांवों में इन दिनों हर किसी की जुबान पर ‘सफाया’ शब्द है। यह शब्द एक दवाई के...