शुक्रवार, नवंबर 11, 2016

क्या हम बिना नगदी के कुछ समय रह सकते हैं


इस दौर में जबकि तमाम तरह की सर्जरी देश में चल रही हैं, यह बात करना कि ‘क्या हम कुछ समय बिना नगदी के रह सकते हैं,’ अटपटी लग सकती है। हालांकि यह उतनी अटपटी नहीं है जितनी कि आज के दौर में बना दी गई है। यह कोई नयी बात नहीं है, हमारे समाज में पारंपरिक रूप से ऐसा होता चला आया है। आज जबकि पांच सौ और हजार रुपयों के नए नोट लाने पर ‘देश थमने’ जैसा हंगामा खड़ा हो गया तभी मुझे अचानक वह सब स्थितियां एकएक कर याद आने लगी जहां कि बिना नगदी के भी काम चल जाया करता था।

ऐसी व्यवस्था में लेनदेन केवल नगदी और वस्तु आधारित नहीं था, उसके पीछे के रिश्तेनाते और एक दूसरे की खैरखबर भी हुआ करती थी। विकास की मोटरबोट पर सवार जीडीपी के ज़माने में इसे आप पुरातनपंथी राग की संज्ञा भी दे सकते हैं,  लेकिन यह भी सच है कि प्लास्टिक मनी से लेकर ऑनलाइन लेनदेन की एक पल में धराशायी हो जाने वाली व्यवस्थाओं (जैसे कि हमने पिछले दिनों एसबीआई कार्ड के संदर्भ में देख भी लिया) के पीछे अंधी दौड़ लगाते हुए हम समय से कुछ ज्यादा ही तेज भाग रहे हैं। इसमें हम यह भी नहीं देखते कि कौन दौड़ पा रहा है....? कौन नहीं दौड़ पा रहा है...?  कौन पीछे छूट गया है...? और कौन तो इसमें औंधे मुंह गिर ही पड़ा है !

इसे आप बाजार विरोधी (और कई लोग इसे विकास विरोधी भी मानेंगे) सोच भी कह सकते हैं। यह सोच मार्केट को उतना ही फायदा पहुंचाती है,  जिससे कि जीता रहे। इस सोच में हो सकता है कि चमचमाती जिंदगी मयस्सर न हो,  लेकिन यह जरूर है कि जिंदगी बची रहती है वह मशीन नहीं हो जाती। जैसी कि आजकल हो गयी है।

पिछले दिनों ख्यात आलोचक विजय बहादुर सिंह की साहित्य साधना के पचास बरस पूरे होने पर उनके जीवन पर आधारित एक किताब हाथ लगी। इस किताब में शामिल एक चिट्ठी बहुत दिलचस्प लगी,  इसके बाद यह सोच और भी आक्रांत हो गई। मन्ना यानी ‘सतपुड़ा के घने जंगल’ कविता वाले भवानीप्रसाद मिश्र ने एक चिट्ठी में विजय बहादुर सिंह को लिखा है कि ‘हमें धनोपार्जन की स्पर्धा में नहीं पड़ना है। थोड़ी आ​र्थिक तंगी आदमी को आदमी बनाए रखने में मदद करती है। दारिद्रय और संपन्नता मनुष्य को खा लेती है। इन दोनों से बचनाबचाना विचारवानों का सपना रहा है। हमारे सार्वजनिक प्रयत्न इस दिशा में होने चाहिए।‘ 

हमारा समाज आज क्या ऐसा सोच पाता है ? आज अमीर बनने की बात सबसे अधिक होती है और मनुष्य बनने की सबसे कम। यह कुछकुछ ऐसा ही है जैसे शिक्षा अंतिम उद्देश्य नौकरी पाना और नौकरी पाकर अमीर बन हो गया है। इस पूरे दौर के सारे एजेंडों में मनुष्यता का गायब होते जाना खतरनाक संकेत है। मैं इसे कोई साजिश नहीं कहूँगा पर आप ऐसा होता हुआ महसूस कर ही रहे होंगे। अब तो नयी पीढ़ी को ऐसी समझाइश देने वाली पीढ़ी भी नहीं बची। समझाइश दे भी दे तो वैसा माहौल भी तो नहीं है। इसीलिए जब यह सवाल आता है कि ‘क्या हम नगदी के बिना कुछ समय रह सकते हैं...? तो बैचेनी की स्थिति बन जाती है।

समाज में ऐसी व्यवस्थाएं लगभग गायब हैं जहां कि कुछ समय बिना नगदी के भी काम चल जाया करता था। इस पूरे सिस्टम ने बाजार की गुलामी में ऐसा जकड़ा है कि उसका छूटना प्राय: मुश्किल है। आखिर क्यों कुछ कागजी मुद्राओं के एक-दो दिन बंद होने से इतना हल्ला मचना चाहिए ?

याद कीजिए उन व्यवस्थाओं को जब कुछ दिन, कुछ महीने पूरे साल भर एक तंत्र चल जाया करता था। वह बढ़ई,  धोबी,  नाई,  लोहार,  पंडित,  किसान सबक जरूरतों को पूरा कर दिया करता था,  हालांकि उसके अपने गुणदोष प्रेमंचद की कहानियों की तरह सामने आते रहे हैं, लेकिन वहां की मनुष्यता का पैमाना और कथित रूप सी विकसित-डिजिटल-स्मार्ट बसाहटों की मनुष्यता के पैमानों में जो अंतर दिखाई देता है, उसे आप इस दौर में साफ महसूस कर सकते हैं। बिलकुल आप गांव में जाकर अपने बटुए को ताख में रखकर सुकून से यहांवहां घूम सकते हैं, लेकिन शहर का माहौल मुझे ऐसा करने की एक पल भी इजाजत नहीं देता, लेकिन हुआ तो उलटा है। गांव भी अब गांव कहां, वह भी शहर बनने पर आमादा है।

यह कहानी भी अब एक दुखद राग की तरह है जिसे चाहे न चाहे गाना ही पड़ेगा.

राकेश कुमार मालवीय   

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