सोमवार, सितंबर 07, 2015

मानव तस्करी : मलेशिया से 22 लोगों को छुड़ाने में क्यों लगे चालीस दिन


राकेश कुमार मालवीय

छत्तीसगढ़ के 22 लोगों को छुड़ाने में सवा महीने का वक्त लग गया। यह 22 लोग मानव तस्करी का शिकार हुए थे। मानव तस्करी का यह अब तक का सबसे बड़ा मामला है जबकि किसी दूसरे देश में एक साथ इतने लोग बंधक बना लिए गए। इस पूरे मामले में राज्य सरकार से लेकर केन्द्र सरकार सक्रिय तो हुई, लेकिन मजदूरों के अपने घर पहुंचतेपहुंचते सवा महीने से ज्यादा का समय लग गया। मुख्यमंत्री ने इन लोगों की अपने घर सकुशल वापसी पर खुशी तो जताई, लेकिन प्रदेश से हो रही मानव तस्करी रोकने की दिशा में उन्होंने कुछ नहीं कहा। अलबत्ता स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराने का झुनझुना एक बार फिर मिला। गौरतलब है कि विपक्ष लगातार मानव तस्करी के मामले में सरकार को हर विधानसभा सत्र में घेरता रहा है, लेकिन इस पर कोई ठोस काम नहीं किया जा सका है।

मलेशिया के यूरो प्लास्टिक नामक कंपनी में बंधक बनाकर रखे गए छत्तीसगढ़ के 22 मजदूरों अंतत: 1 सितम्बर को अपने घर पहुंचे। इनमें से 15 जांजगीर-चांपा के, पांच महासमुंद के और दो बलौदा बाजार के नागरिक हैं। इन मजदूरों के परिजनों ने सबसे पहले 20 जुलाई को कलेक्टर को शिकायत दर्ज कराई थी, कि मलेशिया की राजधानी क्लालंपुर में 22 लोगों को कंपनी संचालक ने बंधक बना लिया है। इसके बाद जब जिले में श्रम मंत्री भैया लाल रजवाड़े  का दौरा हुआ तो उन्हें भी इससे वाकिफ कराते हुए गुहार लगाई। श्रम मंत्री विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मिले। उन्होंने इस पर कार्रवाई का आश्वासन देते हुए निर्देश दिए। इसके बावजूद चालीस दिन का समय लगना यह बताता है कि गरीब और मजदूर लोगों के लिए हम किस तरह और किस स्तर पर संवेदनशील होते हैं। ठीक यही बात केवल एक विदेशी नागरिक के संबंध में होती तो संभतव: कार्रवाई की कछुआ चाल सामने नहीं आती।

मजदूरों ने लौटकर बताया कि मलेशिया में उनसे 12 घंटे काम कराया जाता था और उनकी पगार भी नहीं दी जा रही थी। महीनेभर से तो उन्हें बंधुआ की तरह रख दिया गया था। बिलाईगढ़ ब्लॉक के परसाडीह गांव के चंद्रहास रात्रे ने बताया कि जाते समय तो उन्हें अच्छे रहवास का वादा किया गया था, लेकिन जब वहां गए तो रहने के लिए उन्हें एक छोटा सा कमरा दिया गया। खाना भी इतना कम कि पेट भी नहीं भरता था। इस बात का विरोध करने पर कंपनी के गार्ड उन्हें धमकाते थे। जांजगीर के देवरमठ के घनाराम ने बताया कि उन्हें रोजमर्रा के काम करने की भी आजादी नहीं थी। आधा पेट खाना देकर उनसे 12-12 घंटे काम लिया जाता था। जांजगीर के दाऊलाल वैष्णव ने बताया कि हमें लगा कि वहां जाकर हम अपने परिवार के लिए पैसा कमाएंगे, लेकिन जब वहां पहुंचे तो स्थिति उल्टी ही निकली। वहां हमसे परिजनों से बात तक नहीं करने दी जाती थी। हमारे मोबाइल फोन छीन लिए गए।
 

-          लेखक नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया के फैलो हैं।

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