सोमवार, अगस्त 03, 2015

बारिश की छोटी—छोटी कविताएं

निकला था घर से
पानी ने मिला लिया,
अब सूख रहा हूं
कुछ गर्मी से
ओढ़ तुम्हारे प्रेम की चादर !

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अंदर से बाहर तक, बाहर से अंदर तक सराबोर हूं,
काजल की तरह अंखियों के चारों ओर हूं !

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शब्द सूख रहे हैं,
वो जो प्रेम की बूंदों से,
तुम्हारे केशों के रास्ते टपक कर,
मेरे अंदर पैठ गए,
हां,
वह सूखकर किसी जीवाश्म से,
सदियों तक,
हां सदियों तक मेरे मन में बैठ गए।

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बूंद ने तय किया एक लंबा रास्ता,
पहले पिघली, प्रेम की गर्मी से
हजारों हजार किमी तक
उड़ी, उड़ती ही रही
और अचानक
गिरी, ऐसी गिरी
हजार बाधाओं को पार कर
सीधे मन पर पड़ी।

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मैंने तय किया
आज नहीं करूंगा बात कोई
सुनाउंगा केवल कविताएं
उसी तरह,
जैसे बाहर हो रही है बारिश।


राकेश मालवीय,  4 August 2015

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