शनिवार, मई 30, 2015

पर्यावरण: चहुं ओर फैला अंधकार

हम उड़तें हैं पश्चिम की ओर:
पश्चिम, ठीक वैसा ही है, एक कसाईघर
हम उड़ते हैं पूर्व की ओर 
पूर्व है, ठीक वैसी ही, एक कैद,

  -  कुओ मो-जो (चीनी कवि) 

पर्यावरण दिवस के आते न आते सब दूर पर्यावरण की रक्षा की चिंता का गगनभेदी सुर नए तरह के प्रदूषण में बदल जाता है। हम सभी किसी अनजान शक्ति या थर्ड पर्सन को विद्यमान और आसन्न आपदाओं के लिए सूली पर चढ़ाने को तत्पर हो जाते हैं। एकाएक धरती को प्राचीन काल में अरब-देश में निवास करने वाले फिनिक्स पक्षी की तरह बना देना चाहते हैं। कहते हैं कि जब उसकी उम्र 500 वर्ष हुई, तो उसने सुगंधित लकडि़यों की एक चिता बनाई और आत्मदाह कर लिया। फिर मृत राख से वह एक ताजगी के साथ अनन्य सौंदर्य सहित फिर से मृत्यु को प्राप्त न होने के लिए पुनर्जीवित हुआ। क्या हम पृथ्वी को इसी मिथक के आधार पर बचाना चाहते हैं? पिछले दिनों इंदौर में एक ही दिन, सुबह और शाम को दो भिन्न विधाओं के महारथियों ने पर्यावरण को बचाने की बात अपने-अपने अंदाज में कही। सुबह पत्रकार और पर्यावरणविद् सोपान जोशी   जहां बहुत सुकोमलता लेकिन प्रतिबद्धता के साथ प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों की लूट, उपभोग व दुरुपयोग को समझाते हुए हमारे युग के छठे प्रलय की शुरुआत समझा गए। वहीं शाम को सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत    न्यायाधीश न्यायामूर्ति ए. के. पटनायक ने प्राकृतिक संसाधनों की असंवैधानिक तरीके से लूट और उसके समाज व पर्यावरण पर पड़ रहे विनाशकारी प्रभावों को ठेठ कानूनी भाषा में समझाया। उनका यह भी कहना था कि प्राकृतिक संसाधन पूंजीपतियों की बपौती नहीं बनना चाहिए। संकट यह है कि हम शायद किसी भी भाषा में अपने हित की बात सुनने समझने को तैयार नहीं हैं।

कुम मो-जो, आगे लिखते हैं,
हम उड़ते हैं दक्षिण दिशा में 
दक्षिण है, ठीक वैसी ही, एक कब्र
हम उड़ते हैं उत्तर  दिशा में
उत्तर है ठीक वैसा ही एक नरक

कुम मो-जो ने यह लंबा गीत फेड् नामक पक्षी को प्रतीक बनाते हुए लिखा है जो चीन में फिनिक्स का पर्याय बना जाता है। अपनी परिकल्पना में प्राचीन चीनी समुदाय शायद और भी आगे था इसीलिए वहां फेड नर है और हुआ  मादा। परंतु चीन सहित पूरी दुनिया पर्यावरण को लेकर जिस तरह का व्यवहार कर रही है, यह पंक्तियां साफ समझा देती हैं।

आज दुनिया में सात अरब से ज्यादा मनुष्य निवास करते हैं। आधुनिक विकास की समस्या यह है कि वह इस पृथ्वी ग्रह को मनुष्य की बपौती मान बैठा है और बाकी के प्राणी और वनस्पति उसके लिए कोई मायने नहीं रखते। जबकि वह अपनी ही अंतरिक्ष खोजों से जान चुका है कि पृथ्वी को जीवंत बनाने या बसाने में मनुष्य का नहीं अन्य परिस्थितियों का योगदान है। और सृष्टि के विकास के क्रम में मनुष्य महज एक सह उत्पाद या बाय प्राॅडक्ट भर है। लेकिन मनुष्य नामक प्राणी का घमंड और हठधर्मिता चरम पर है। इसी भ्रम को तोड़ने के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ ने सन् 2015 के पर्यावरण दिवस की विषय-वस्तु ‘‘एक विश्व-एक पर्यावरण‘‘ तय की है। और कहा है, ‘‘सात अरब सपने, एक ग्रह,संभाल कर उपभोग करें।‘‘ बात को समझाने का प्रयास करते हुए कहा गया है, ‘‘सन 2015 की विषय-वस्तु का तात्पर्य है कि मानवता, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था का कल्याण अंततः इस ग्रह के प्राकृतिक संसाधनों के जवाबदेह प्रबंधन पर ही निर्भर करता है। तथ्य बता रहे हैं लोग इतना ज्यादा उपभोग रहे हैं जितना कि प्राकृतिक संसाधन सुस्थिर रूप से उपलब्ध नहीं करा सकते। यदि उपभोग और उत्पादन प्रणाली का वर्तमान ढर्रा बदस्तूर चलता रहा तो सन 2015 तक पृथ्वी के अनेक ईकोसिस्टम खतरनाक स्तर तक रिक्त (खाली) हो जाएंगे या यह अनपलट (जिन्हें दोबारा जिंदा नहीं किया जा सकता) हो जाएंगे। यह संभावना है कि हमारी जनसंख्या तब तक 9.5 अरब तक पहुंच जाएगी। और तब हमें हमारी यही जीवनशैली बनाए रखने के लिए इस जैसे तीन ग्रहों की आवश्यकता पड़ेगी। यदि हमें इसी ग्रह की सीमा में रहकर एक स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित करना है तो इन स्थितियों में बदलाव ही सर्वश्रेष्ठ रणनीति हो सकती है।‘‘
परंतु ऐसा कोई प्रयास हमारे सामने नहीं आ रहा है।

 सोपान जोशी के शब्दों में कहें तो पर्यावरण संबंधी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन कमोवेश मनहूसियत के मेलों में परिवर्तित हो चुके हैं। हम सभी देख रहे हैं कि पिछले दो दशक जो सर्वाधिक प्रदूषणकारी रहे हैं उनमें  हम किसी भी समझौते पर नहीं पहंुचे। विकसित देश अपने ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कमी पर तैयार नहीं हैं तो विकासशील देशों की जिद है कि हम तय उच्चतम सीमा तक पहंुच कर सन् 2030 या उसके बाद अपने उत्सर्जन में कमी लाएंगे। बहाना या दुहाई है कि विकास को अंतिम आदमी तक पहुँचाना  है। 28 मई के समाचार पत्रों के प्रथम पृष्ठ पर दो समाचार है । पहला, यह कि इस शताब्दी के अंत तक हिमालय के ग्लोशियर 70से 99 प्रतिशत तक नष्ट हो सकते हैं और दूसरा समाचार है इस वर्ष भारत में गर्मी से मरने वालों का आंकड़ा 1500 की संख्या को पार कर चुका है। इसमें से 1360 मौतें सिर्फ आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में हुई हैं। इसके पीछे का एक वैज्ञानिक कारण अल्ट्रावायलट किरणें और दूसरा कारण ज्यादा समय तक धूप और लू में रहना है। ऐसा माना जाता है कि इन किरणों का सामान्य स्तर 0से 7 तक (मापने की वैज्ञानिक विधि) तक रहता है। लेकिन इस समय यह आंध्र,तेलंगाना व ओडिशा में यह स्तर 12 के ऊपर है। इसकी वजह से लोगों को लू लग रही है। माना जाता है कि यदि कोई व्यक्ति आधा घंटे तक इस स्तर की किरणों के सीधे प्रभाव में रहता है तो उसकी मौत हो सकती है।

यह सबकुछ ओजोन की परत में हुए छेद का परिणाम है। परंतु हम अपनी जीवनशैली व उत्पाद प्रणाली में परिवर्तन को तैयार नहीं हैं। पर्यावरण नाश से इतने लोगों की दर्दनाक मौत भी मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू को आंध्र में सिंगापुर निर्माण की उनकी योजना से डिगा नहीं पाएगी। वही दूसरी ओर इस वक्त अमेरिका दुनियाभर में एयरकंडीशनर एवं रेफ्रिजिरेटरों में ठंडक लाने की एक नई तकनीक या नई गैस हाइड्रोफ्लोरोकार्बन्स के प्रयोेेग का दबाव बना रहा है। यह गैस कई मायनों में पूर्व में प्रयोग में लाई जाने वाली गैसों से ज्यादा खतरनाक है।  दूसरी बात यह है कि इस गैस का प्रयोग करने वाले उपकरणों में ऊर्जा ज्यादा मात्रा में लगती है। परंतु अमेरिका की जिद के आगे किसकी चली है। राहुल सांकृत्यायन ने भागो नहीं दुनिया को बदलो मंे लिखा था, ‘‘पंूजीपतियों का राज है, कल कारखाने वाले करोड़पतियों का राज है। आज से तीन सौ बरस पहले (30 जनवरी 1649 ई) को विलायत के व्यापारियों ने अपने राजा चाल्र्स का सिर कुल्हाडे़ से काट डाला था, उसी दिन से प्रभुता व्यापारियों के हाथ चली गई, लेकिन कारखाने खुलने और पूंजीपति पैदा होने में अभी डेढ़ सौ साल और लगने वाले थे। व्यापारियांे से ही पूंजीपति पैदा हुए। और पूंजीपतियों को सिर काटने भर से सन्तोष नहीं हो सकता था, बल्कि वह सिर काटने को नुकसान की बात समझने लगे।‘‘

अतएव दुनिया को बदलने और पर्यावरण को बचाने दोनों का एक ही तरीका है उपभोग व उत्पादन दोनांे पर नियंत्रण। हमारी नई सरकार जिस तरह का औद्योगिकरण चाहती है वह संसाधनांे के विनाश पर ही टिका है। अब जबकि हमें स्पष्ट चेतावनी मिल चुकी है कि सन 2025 तक हमारा पूरा देश पानी की कमी वाला देश हो जाएगा तो हमें अपने विकास के माॅडल को नए सिरे से तैयार करना होगा और न्यूनतम ऊर्जा एवं मानव श्रम से उत्पादन को बढ़ावा देते हुए पुनः नए सिरे से सोचना होगा। महात्मा गांधी का ‘‘हिंद स्वराज‘‘इसमें हमारी मदद कर सकता है। कुओ मो-जो ने मादा (फिनिक्स) हुआग के मंुह से कहलवाया है,

जग-जग जग-जग, जग-जग,
जग-जग जग-जग, जग-जग,
आंसुओं के पांच सौ बरस बहे हैं मोतियाबिंद की तरह, 
आंसुओं के पांच सौ बरस टपके हैं मोमबती से मोम की तरह।

क्या हम पर्यावरण के आंसू पोछ पांएगे?

- चिन्मय मिश्र

कोई टिप्पणी नहीं: