रविवार, मार्च 01, 2015

सरकार सड़क, गांव और मैं


मुझे याद नहीं आ रहा कि‍ मेरे गांव में कितने लोगों के पास घर नहीं हैं। कच्चे—पक्के जैसे भी हैं हैं तो, बारिश में एक अदद छत मिल ही जाती है, हां लेकिन जब यह देखता हूं कि गांव में बेरोजगार कितने हैं तो मुझे एक के बाद एक चेहरे याद आते जाते हैं। मुझे लगता है मेरे गांव में रोजगार की एक बड़ी समस्या है। इस बजट में आजीविका मिशन की योजना पर तीन हजार करोड़ रुपए और आवास पर 14 हजार करोड़ का प्रावधान है। मुझे ऐसा लगता है कि यदि यह उल्टा होता तो ठीक होता। रोजगार ज्यादा दोगे तो मकान तो बनने ही लगेंगे, लेकिन हम उन्हें सक्षम बनाने की बजाए कटोरा पकड़ाने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। सरकारें ऐसा मानती हैं, कुछ देने से ही वोट मिलते हैं। कुछ चकाचक दिखाने से ही वोट मिलते हैं, तभी तो चालीस हजार करोड़ की  बड़ी रकम देश में सड़क बनाने के लिए है। तर्क यह भी हो सकता है कि बाकी की जो योजना—आयोजनाएं हैं उनसे भी तो रोजगार का सृजन होगा, इस बात को मैं खारिज भी नहीं करता, लेकिन हां उम्मीद यह जरूर कर रहा था, कि देश में अर्से बाद पूर्ण बहुमत देने वाली सरकार अपनी पूरी ताकत से रोजगार को अपना सबसे बड़ा एजेंडा बनाएगी, पर क्या ऐसा हुआ है, सांख्यिकी तो यह नहीं बता रही।

मेरे गांव में अब तक कोई ढंग का अस्पताल नहीं बन सका। ठीक है, गांव में नहीं बना, तहसील में तो बन जाता, तहसील में नहीं तो जिले में ही बन जाता। अब जब भी कोई इमरजेंसी होती है, सीधे सौ किमी दूर भागना होता है भोपाल। जान बचानी है तो भोपाल ही एकमात्र जगह है। मेरे गांव जैसे दूसरे गांवों के पास अब भी अस्पताल के लिए कोई बीस—तीस किमी के विकल्प मौजूद नहीं हैं। हां, कुछ निजी अस्पताल जरूर हो गए, लेकिन वह लाभ आधारित व्यवस्थाओं पर चलते हैं, और मुझे अच्छे से पता है कि मेरे गांव में आधे से ज्यादा लोग उन अस्पताल में भर्ती नहीं हो सकते हैं। मेरे अपने मोहल्ले में कई लोगों को इलाज के लिए जमीन तक गिरवी रखना पड़ा है। इससे मुझे यह समझ आता है कि सरकारी अस्पताल, सरकारी स्कूल और ऐसी दूसरी सेवाएं अब भी देश के लिए कितनी जरूरी हैं। लेकिन इसे जब मैं अपने देश के बजट की सांख्यिकी में समझने की कोशिश करता हूं तो पता चलता है सरकारी ऐसे सस्ते इलाज की सेवाओं का बजट आवंटन लगातार कम कर रही है। 125 करोड़ भारतीय लोगों के लिए साल भर में 25 हजार करोड़ रुपए का भी प्रावधान नही हो पाता। मुझे वरिष्ठ पत्रकार साईनाथ की वह बात याद आ जाती है, जब भारत में गरीबी बढ़ने के कारणों में बड़ा कारण स्वास्थ्य पर होने वाले खर्चे को बताते हैं। लेकिन हां, सड़क तो बन गयी। और रास्ते में पड़ने वाली बड़ी बाधा खत्म हो गयी। बुधनी फाटक के उपर फलाई ओवर बन गया। उस फलाई ओवर से सीधे उड़कर हम भोपाल के अस्पतालों की जीडीपी में योगदान कर ही देते हैं। जान बच जाती है।

मैंने पहली से एमजे तक किसी गैरसरकारी शिक्षा संस्था में नहीं पढ़ा। मुझसे 12 साल छोटा भाई जरूर पांचवी से गांव में खुले प्राइवेट स्कूल में दाखिल हो गया। यह स्कूल मेरे दोस्त ने ही खोला था। मुझे कभी किसी गैरसरकारी स्कूल में पढ़ने की इच्छा भी नहीं हुई। सभी विषय के मास्टर थे, प्रशिक्षित थे। लेकिन उनके रिटायरमेंट के साथ पद खाली होते गए, और फिर स्कूल में वैसे शिक्षक आए जिन्हें सरकार ने ही पूर्ण शिक्षक का दर्जा नहीं दिया। इन्हें सरकार शिक्षाकर्मी कहती रही, तो समाज क्या कहता। समाज ने भी उन्हें वैसे ही देखा, कभी पूरा शिक्षक नहीं समझा, वैसा सम्मान नहीं बना। हालांकि गांव में दसवीं वाला स्कूल बारहवीं तक हो गया, लेकिन इधर देखता हूं कि तीन सालों से गांव में वैन आ जाती है। ब्लॉक के सबसे बड़े स्कूल की वैन का दायरा 17 किमी दूर मेरे गांव तक पहुंच गया है, जो एक तरह से ब्लॉक का तीसरा आखिरी गांव है। जाहिर है सड़कें बन गयी हैं, गांव के बच्चे पढ़ने के लिए शहर जा रहे हैं क्योंकि मेरे गांव के स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं। हालांकि देश के बजट की दूसरी सबसे बड़ी रकम शिक्षा पर खर्च हो रही है, लेकिन मुझे यह बात बिलकुल समझ नहीं आती कि मेरे गांव के स्कूल उन्न्त होने की जगह अवनत कैसे हो रहे हैं।

और तीसरी और आखिरी बात जिसे मैं अपने करीब महसूस करता हूं, खेती की। मेरा गांव एक कृषि प्रधान गांव है। दो फसलें यहां कई बरसों से ली जाती हैं, और पिछले दो—तीन सालों से तीन फसलों तक यह जा पहुंची है। पिछले साल जब मैं दिवाली पर पहुंचा था तो गांव में कम पटाखे फूटे थे। इसको जब मैंने जानने की कोशिश की तो पता चला कि उस साल गेहूं की फसल ठीक हुई । केवल एक फसल के पिट जाने से यह हाल था। मुझे याद आया कि देश में बीमा पर इन दिनों काफी काम किया गया है। फसल बीमा को भी बजट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सरकारों ने माना है। लेकिन जब पिछले दो—तीन सालों में खराब हुई फसलों पर मुआवजे की राशि पर गांववालों से बात करता हूं तो बहुत हास्यास्पद स्थिति दिखती है। किसान अपनी फसल के बीमा पर वैसे आश्वस्त नहीं दिखते जैसा कि शहर में एलआईसी की कोई जीवन बीमा या हेल्थ प्लान की पॉलिसी लेकर करता है। ज्यादातर किसान केवल सोसायटी से सब्सिडाइज्ड खाद—बीज के फेर में बीमा की रकम को एक रिश्वत की तरह देते हैं, क्योंकि उन्हें सब्सिडाइज्ड सुविधाएं चाहिए। मुझे गांव से लगी हुई डामर की सड़क दिखाई देती है। इस सड़क से खाद— बीज बाजार के तय दामों पर आते हैं, लेकिन मुझे एक दूसरी तस्वीर भी दिखाई देती है, कि इसी सड़क से किसानों की फसल के दाम उसके तय मूल्य पर बिकने के लिए नहीं जाते हैं। यह देश की अकेली ऐसी व्यवस्था है जहां उत्पादक अपने उत्पाद का मूल्य खुद तय करते दिखाई नहीं दिखाई है।

हां, सरकार ने किसानों के लिए कर्ज की बड़ी व्यवस्था की है। उन्हें खाद—बीज के लिए सस्ती ब्याज दरों पर कर्ज मुहैया कराया जाएगा। लेकिन मुझे गांव के बुजुर्गों की बात याद आती है। गांव में कर्ज को अच्छे नजरिए से नहीं देखा जाता। बुजुर्ग कहते हैं कुछ भी कर लेना कर्ज नहीं करना। हालांकि कर्ज जरूरी भी है क्योंकि लगातार घाटे में जाती खेती—किसानी के बीच यह कर्ज राहत लेकर आता है। पर यह समझ नहीं आता कि खेती—किसानी को फायदे में ले जाने की नीति इस बजट में कहा है। क्या उपजों का समर्थन मूल्य बढ़ाने की बात इसमें आती है, क्या उस पर किसी बोनस की बात आती है। क्या उर्वरक जिनके लिए किसान परेशान नजर आते हैं और काले बाजार से खरीदते हैं, उनकी सप्लाई व्यवस्था को दुरुस्त करने की नीति दिखाई देती है, क्या जैविक खेती के लिए कोई नीति है।

यह सब देखता हूं तो मुझे सड़क झूठी दिखाई देती है। आप मुझे सड़क विरोधी भी कह सकते हैं, विकास विरोधी भी मान सकते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि यह सड़क गांव से केवल ले जाने के लिए बन रही है, गांव तक लाने के नहीं। क्योंकि मैं खुद भी इसी सड़क के रास्ते होकर शहर में आकर धंस गया हूं।

राकेश कुमार मालवीय
28/FEB/2015

1 टिप्पणी:

Barun K. Sakhajee ने कहा…

अच्छा विश्वलेषण है। बजट का आम आदमीकरण।