बुधवार, मार्च 12, 2014

सड़क पर गुजर रहे इस आम आदमी का क्या दोष था ?

राकेश मालवीय, रायपुर। वह एक कॉमन मैन था। मोटर मैकेनिक। छोटी सी दुकान से चार जनों के परिवार का पेट पाल रहा था। उसे पता था कि जिस इलाके में वह रहता है वहां जिंदगी उतनी ही कठिन है, लेकिन इसका कतई अंदाजा नहीं था कि एक दिन एक गोली सनसनाती हुई आएगी और उसकी खोपड़ी को लहूलुहान कर देगी। कतई नहीं, इसलिए क्योंकि उसका तो अपने काम से काम था, न वह नक्सलियों का समर्थक था और न ही उसने उनके खिलाफ कभी कोई खबर दूसरी तरफ पहुंचाई।

कल सुकमा जिले के तोंगपाल के 16 शहीदों में एक नाम ऐसा भी था जिसने कभी बंदूक अपने कांधे पे नहीं टांगी। इस आम आदमी का नाम था विक्रम निषाद। वह जगदलपुर का रहने वाला था। 15 साल पहले सुकमा आया, दुकान चल निकली, अपने व्यवहार से उसने लोगों में पैठ बनाई और फिर सुकमा का ही होकर रहा गया।


कल मंगलवार का दिन इसके लिए सबसे बड़ा अमंगल लेकर आया। सुकमा कस्बे का बाजार इस दिन खुद को बंद रखता है। विक्रम की दुकान का शटर भी कल गिरा हुआ था। सुकमा के सारे व्यापारियों की तरह वह जगदलपुर से दुकान का सामान लाने के लिए अपनी मोटरसाइकिल से निकला था, अकेला ही।

कान में ईअरफोन लगाए वह मोबाइल पर कोई गाना सुन रहा था। खुशी इस बात की भी थी कि बीती रात को उसने अपने पांच साल के बेटे मयंक निषाद का जन्मदिन हंसी-खुशी मनाया था। यह खुशी अगले दिन परिवार के सबसे बड़े मातम में तब्दील होने वाली है, किसे पता था।

नक्सलियों के एंबुश में वह जवानों के साथ धंसता चला गया। गोली को क्या पता था कि वह पुलिस का जवान नहीं है। वह नहीं रुकी। धंसती चली गई। खोपड़ी में भीतर तक ।  गोली ने अपना काम किया। उसकी आत्मा जो नहीं थी। पर क्या गोली चलाने वाले की आत्मा भी गोली की तरह ही बेजान थी? लहू केवल वहां नहीं बहा जहां विक्रम निषाद की लाश पड़ी थी। कुछ किलोमीटर दूर तीन शरीरों की छह आंखों में भी खून की नदी उतर आई। चेहरों पर विलाप था और जुबान पर केवल एक सवाल हमारा क्या दोष था ?

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