मंगलवार, जुलाई 30, 2013

मैं सड़क ! तुम जख्म के सिवाय मुझे दोगे क्या!!

कुछ दिन पहले ही तो मुझे बनाया था। उस रात कुछ लोग आए। हाथों में औजार थे। मेरे सीने पर एक एक कर कई प्रहार। मैं चिल्लाती रही पर सुनने वाला कोई नहीं था। कुछ ही देर में मेरा चेहरा बिगाड़ कर चले गए। कई—कई जगह गहरे—गहरे घाव। 

तुम्हें क्या पता था कितनी कोशिशों के बाद तो मेरा चेहरा सुधर पाया था। कितने ही दिनों मेरी फाइल इस टेबल से उस टेबल पर पड़ी रही, चलती रही। कुछ घंटों का सफर मीलों का हो गया। यहां तक कि मौसम बदल गए। लोग मेरी दशा पर मुझे कोसते, गाली देते, गरियाते। कई बेचारे तो गिरते, गिरकर उठते और मुझे ऐसी निगाहों से देखते जैसे सारा दोष मेरा हो। पर मैं अपनी पीड़ा क्या कहूं। मैं तो खुद ही व्यवस्था का शिकार हूं। 

आप क्या समझो। पर जरा सोचो। क्या थोड़ा भी सुकून मिलता है कभी मुझे। अब तो रात को भी शहर जागता है, और मुझे भी सोने नहीं देता। बताओ ऐसे में मेरी दशा ठीक रहे थी तो कैसे। मैं इस बात की तो बिलकुल भी बात नहीं करना चाहती कि मुझे संवारने में किसने क्या गोलमाल किया। क्योंकि यह बात सभी जानते हैं। 

पर जो दर्द इन लोगों ने अभी—अभी मुझे दिए वह मुझे जरूर साल रहे हैं। हां, चूंकि ​चुनाव आ रहे हैं तो मुझे भी कई सालों से एक जरूरी मुद्दा तो माना ही गया। कई नेताओं ने मुझे अपनी उपलब्धि बताया तो कुछ मेरे मुद्दे पर हार भी गए। पर अब तो सीडी चलन में है। सीडी के मुद्दे पर ही तो कल जमा हो गए थे सारे। अब तो ऐसी रैलियां होती रहेंगी और मैं ऐसे ही खुदती रहूंगी, व्यवस्था और बेरीकेड्स के नाम पर। 

मैं मानती हूं व्यस्था तो बनानी ही पड़ती है। पर क्या तुम जरा दूर की नहीं सोच सकते। एक महीने बनना शुरू होती है और दूसरे महीने खुदना। बस दुख तभी होता है जब छोटे—छोटे बच्चे इससे झटके खाते हैं, बुजुर्ग गड़ढों में गिर जाते हैं, लोग परेशान होते हैं और तुम नारे लगाते हो, हंसते हो, गरियाते हो, तुम्हारी भाषा में व्यवस्था बनाते हो।

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