शनिवार, मई 25, 2013

हिरनखेड़ा सेवा सदन के वे दिन वकालत और राजनीति-1


इंटरनेट की खंगाली में आज जो कुछ हाथ लगा, वह जबर्दस्त है। यह एक ऐसा दस्तावेज है जो हम कई साल से खोजने की कोशिश कर रहे थे। हमारे गांव हिरनखेड़ा से जुड़ी हुई यादें और उसके ऐतिहासिक पक्ष का एक बहुत महत्वपूर्ण दस्तावेज। यह संयोग ही है कि उदंती डॉट कॉम की संपादक रत्ना वर्मा ने अप्रैल अंक में मेरी कविता मलाजखंड प्रकाशित की। ( जिसे आप इसी ब्लॉग पर मेरी कविताएं सेक्शन में देख सकते हैं) और आज खोजते—खोजते उनके ही इसी ब्लॉग पर मैं इस दस्तावेज तक जा पहुंचा। आप भी पढ़िए दिलचस्प है यह जेल डायरी। इसकी यह पहली किस्त है। रत्ना वर्मा को आभार सहित। राकेश


सेंट्रल जेल रायपुर ता. 16 जुलाई 1975 



हिरनखेड़ा सेवा सदन (होशंगाबाद के पास) जो पं. माखनलाल चतुर्वेदी की संस्था थी, में मुझे चौथी हिन्दी पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए भेजा गया, क्योंकि मेरे पिताजी के अनुसार वहां पर स्वराज्य आंदोलन तथा स्वदेशी शिक्षा राष्टï्रीय विचार धारा के आधार पर होती थी। वहां हम सब को खादी पहनने को कहा जाता था तथा दिनचर्या के सभी काम अपने हाथ से करने के लिए प्रोत्साहित करते थे।

यह संस्था जंगल के बीच स्थित थी। हिरनखेड़ा गांव के एक मालगुजार जो कुर्मी जाति के थे, ने इस संस्था के लिए जमीन दान में दी थी। हमें संस्था में खाने के लिए सुबह नाश्ता नहीं मिलता था अधिकतर रोटी ही खाया करते थे। मेरे लिए पिता जी ने अलग से नाश्ते का इंतजाम करने को जरूर कहा पर वहां किसी के साथ भेदभाव का बर्ताव नहीं किया जाता था, सबको सामूहिक रूप से रहना पड़ता था अत: अलग से एक दो लिए नाश्ते की व्यवस्था संभव नहीं था। वहां हम सब अपना कपड़ा अपने हाथ से धोते थे, नहाने का पानी भी कुएं से स्वयं निकालते थे तथा अपने रहने का स्थान यानी अपनी कु टिया भी सब मिलकर साफ करते थे।

 इस तरह हर प्रकार से हमें स्वावलंबी बनने की शिक्षा दी जाती थी। प्रतिदिन सुबह चार बजे रा्ष्ट्रीय प्रार्थना होती थी। सुबह इतनी अधिक ठंड होती थी कि उठने में मुझे आलस आता था। पर मजबूरी थी क्योंकि ऐसा न करूं या कोई इस नियम का पालन न करे तो बेंत की मार खानी पड़ती थी। रोज सुबह पंडित जी को प्रणाम करने भी जाना पड़ता था जबकि पंडित जी अपनी कुटिया में मजे से रजाई ओढ़ के सोये रहते थे। वे सबको आशीर्वाद देते थे और ध्यान भी रखते थे कि कौन उनके पास आया और कौन नहीं आया, क्योंकि वे सबकी आवाज पहचानते थेे। उस वक्त तो वे कुछ नहीं कहते थे पर बाद में अच्छी मरम्मत होती थी। खाने को भी साधारण भोजन मिला करता था लेकिन पिताजी ने, मुझे दूसरों से दुगुना घी दिया जाय इसकी व्यवस्था कर दी थी, जो कि मुझे मिलता भी था। मुझे उस घी का स्वाद अभी भी याद है। वहां का घी बड़ा शुद्ध और स्वादिष्टï होता था। मैं अपने घर पलारी आता था तो घर का घी मुझे उतना अच्छा नहीं लगता था, मालूम नहीं क्या बात थी?

हम वहां जंगल के बीच रहते थे। रोज जंगली सुअर हमारे कमरों के आसपास रात में घुमते रहते थे कभी-कभी उनके बच्चों को हम लोग पकड़ लेते थे तो वे (सुअर) हमारा कमरा घेर लेते थे तब हमें उनके बच्चे को छोडऩा पड़ता था। बड़े-बड़े दांत वाले सुअर खतरनाक थे। चूंकि सेवा सदन जंगल के पास स्थित था इसलिए आस- पास हमेशा सांप, बिच्छू का भी भय बना रहता था, दो- चार दिनों में एक दो सांप हम लोग मारते ही थे। हमारे पास हॅाकी स्टिक रहती थी, खेलने के लिए उससे ही सांपों को मारने और कुत्तों को भगाने का काम लेते थे। यह सब हमारी दिनचर्या का अंग बन गया था इसलिए हमें डर नहीं लगता था, आदत पड़ गई थी और इन सबमें हमें बहुत मजा आता था। हममें से बहुत से विद्यार्थियों को हिन्दी बोलना नहीं आता था क्योंकि हम सब गांव से गये थे । अत: दूसरे विद्यार्थी हमारी भाषा सुनकर हंसते थे।

इन खट्टïी- मीठी यादों के साथ हिरनखेड़ा में चार वर्षों का जो समय मैंने बीताया वह कई अर्थों में मेरे लिए बहुत उपयोगी रहा। मेरे भविष्य के लिए, सामाजिक व राजनैतिक नीव वहां रहने से ही पड़ी। बाहर रहकर पढ़ाई करने से स्वावलंबी बनने में सहायता तो मिली ही साथ ही घर के लोगों से अलग, अकेले रहने की आदत भी पड़ी। उन दिनों मेरे बचपन के जो साथी थे उसने आज भी आत्मीयता बनी हुई है। कुछ तो अभी भी हैं कुछ स्वर्ग सिधार गये हैं, उनकी याद हमेशा आती है। हम सब हिरनखेड़ा में प्रेम से रहते थे। हमने अपने बचपन का एक अच्छा समय साथ में बिताया था।

मैं साल में एक बार घर आता था। परंतु एक बार बीच में ही घर आ गया तो पिताजी बहुत नाराज हुए और मुझे घर में घुसने नहीं दिया। जब काकाजी (बलीराम- पिताजी के छोटे भाई) तथा बड़े पिताजी सदारामजी (पिताजी के बड़े भाई) को पता चला तो वे दुखी हुए और मुझे अपने पास छिपा कर रखा। जब पिताजी का गुस्सा शांत हो गया तब मैं घर गया। इन सबके बावजूद मुझे याद नहीं है कि पिताजी ने मुझे अपने सामने खड़ा करके मेरे प्रति कभी गुस्सा किया हो या डांट लगाई हो। कभी कुछ कहना भी होता था तो दूसरों के जरिये या मेरी गैरहाजरी में। बाद में जब मैं पढ़ाई पूरी कर वकालत करने लगा तब मुझे महसूस हुआ कि वे जो भी कहते थे मेरे हित के लिए कहते थे। लोगों ने यह भी बताया कि बाद में उन्हें बहुत दु:ख होता था तथा कभी-कभी उनके आंसू भी निकाल आते थे।

पिताजी ने मुझे आगे बढ़ाने में, चाहे वह पढ़ाई हो, सामाजिक कार्य हो, घर का काम हो या राजनीति हमेशा प्रोत्साहित किया, किसी भी कार्य के लिए बाधा नहीं डाली तथा दिल खोलकर अपना पूरा प्यार दिया। अब जबकि वे नहीं हैं, मुझे लगता है काश वे होते तो मुझे तथा मेरे परिवार को देखकर कितना सुख व आनंद का अनुभव करते, मैं उस पल को लिखने में असमर्थ हूं। मैं सिर्फ अनुभव कर सकता हूं तथा दिल को थाम कर रह जाता हूं। ईश्वर उनकी आत्मा कों शांति प्रदान करें। यही कहकर चुप बैठ जाता हूं कि ऐसा पिता सभी को मिले यहीं मेरी कामना है।



जीवन परिचय- बृजलाल वर्मा

जन्म: 16 मार्च 1916 ग्राम पलारी जिला रायपुर, छत्तीसगढ़ मृत्यु: 20 जुलाई 1987 पिता: श्री कलीराम वर्मा शिक्षा:प्रायमरी शिक्षा- ग्राम पलारी 8वीं- हिरनखेड़ा सेवा सदन होशंगाबाद मं. प्र. (पं. माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा संचालित) मिडिल बोर्ड -परीक्षा खंडवा गवरमेंट हाई स्कूल मेट्रिक- बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी का सेंट्रल हिन्दू स्कूल (पं. मदनमोहन मालवीय द्वारा संचालित) इंटरमीडिएट- सिटी कॉलेज, जबलपुर. बी. ए., एल. एल बी. -मॉरिस कॉलेज, नागपुर सामाजिक जीवन: -1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब वे मॉरिस कॉलेज, नागपुर में कानून की पढ़ाई कर रहे थे तब आंदोलन की गतिविधियों मे संलग्न रहने के कारण एक वर्ष परीक्षा से वंचित किया गया। -1944 से बलौदा बाजार में वकालत शुरू की। उन्होंने वकालत को पेशे के रूप में कभी नहीं अपनाया, इसे शोषण के विरूद्ध लड़ाई का माध्यमबनाया। -इसी दौरान वे सहकारी आंदोलन से जुड़े और उन्होंने किसानों में जागृति लाने का बीड़ा उठाया। इस आंदोलन के नेतृत्व के दौरान वे जेल भी गए। -पलारी को जिले का पहला विकास खंड ब्लाक बनाने का श्रेय। -सुभाष सहकारी विपणन संस्था पलारी की स्थापना। -किसान राइस मिल पलारी की स्थापना एवं मिल हेतु जमीन दान। -अपनी पुश्तैनी संपति- बालसमुंद जलाशय पलारी को किसानों के हित में राज्य शासन को सौंपा। -सिद्धेश्वर मंदिर पलारी (8वीं शताब्दी) का जीर्णोद्धार एवं बालसमुंद जलाशय का घाट निर्माण। राजनीतिक जीवन: -1952 से 1972 तक विधानसभा सदस्य एवं केबिनेट मंत्री -1952 आजादी के बाद प्रथम आम चुनाव में एसेम्बली के लिए चुने गए। -1957 दूसरे आम चुनाव में चुने गए -1962 तीसरे आम चुनाव में चुने गए -1967 से 1968 - संविद शासन मध्य प्रदेश के आठ विभिन्न विभागों के केबिनेट मंत्री- सिंचाई, विधि, योजना, विकास, कानून, जेल एवं अन्य विभाग। -1974 से 1977 तक प्रदेश अध्यक्ष, जनसंघ- मध्य प्रदेश -1975 में आपातकाल के दौरान वे 22 माह तक राजनैतिक मीसाबंदी के रूप में रायपुर, सिवनी, जबलपुर तथा तिहाड़ जेल दिल्ली में रहे। -1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी से महासमुंद से संसद सदस्य -1977 से 1979 - केन्द्रीय केबिनेट मंत्री- उद्योग एवं संचार मंत्रालय भारत सरकार।

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