बुधवार, सितंबर 26, 2012

तुम बहुत याद आओगी ज्योति दीदी।

यमुना, ज्योति, ब्रजेश। बालसमूह। होशंगाबाद जिले के 16 गांव और यह तीन नाम। पिछली सदी के कुछ आखिरी और इस सदी के चंद  शुरूआती साल। नाटक, चित्र, गीत, कविता, कहानी, मौज—मजा, मस्ती, बालमेले, उड़ान, चकमक, बालप्रयास, रूठना—मनाना, प्यार और डपट भी। आज जब इन तीन में से एक नाम हमारे साथ यूं वर्तमान से इतिहास में तब्दील हो गया तो अपने बचपन से किशोर होने तक और उसके साथ ज्योति दीदी के जुड़ाव और योगदान को दोहराने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया चल रही है। वह पिछले कई महीनों से पूरी जीवटता के साथ मौत से संघर्ष कर रही थीं, हमें विश्वास था कि इस लड़ाई में भी उन्होंने जीत हासिल कर ली है, लेकिन!

बहरहाल मौत नियति है। वह आनी ही है, हम में से कई बड़ी लंबी उम्र ​जीते हैं, कई बार ऐसी लंबी उम्र केवल उम्र होती है, उसमें सार्थकता नहीं होती। हमारी ज्योतिदी ने अपने घर के नाम की तरह ही छोटी उम्र जी हो लेकिन वास्तव में यह उसमें पूरी सार्थकता थी, जिसने हिरनखेड़ा, आमूपुरा, टुगारिया, बैराखेड़ी, महेन्द्रवाडी, परसापानी, रैसलपुर, भीलाखेड़ी जैसे गांव के बच्चों को एक सृजन संसार दिया। इन चंद गांवों में उस जमाने के हजारों बच्चों के लिए ज्योतिदीदी का गांव में आना और गतिविधियों में भाग लेना वही समझ सकता है जो इसका सहभागी रहा हो।

यह साल 1994 का कोई दिन रहा होगा। मेरे साथी चम्पालाल कुशवाहा ने बताया कि होशंगाबाद के एकलव्य में उसकी दो दीदीयों से मुलाकात हुई है। वह हमारे चकमक क्लब के लिए मदद करने के लिए राजी हैं। उस वक्त तक हम चकमक क्लब की एक छोटी—मोटी शुरूआत हमारे गांव में ही कर चुके थे। चकमक पढ़कर, टुलटुल दीदी, कविता दीदी के साथ चिटिठयों से बात कर और चम्पालाल भाई तो सवालीराम के दोस्त थे ही। हमें लगा कि चलो अब अपन अच्छे से चकमक क्लब चला पाएंगे।

आमूपुरा में सुनील भाई, मदन भाई पहले से ही चकमक क्लब चला रहे थे। हिरनखेड़ा में भी हमने अब ज्योति दीदी, यमुना दीदी और बिरजू भाई के साथ गतिविधियां शुरू कीं। हर महीने के पहले शनिवार—रविवार को होशंगाबाद मीटिंग में जाना, माह भर की योजना बनाना, पिछले महीने की रिपोर्ट सभी के साथ बांटना। पुस्तकालय में दुनियाभर की किताबें देखना—पढना, अपने गांव में बाल पुस्तकालय बनाना और चलाना सीखना। एकलव्य के आफिस में विज्ञान के उपकरणों को सीधे देखना, जो शायद स्कूल की प्रयोगशाला में संभव नहीं हो पाते थे, सवालीराम भाई मतलब महेश बसेडिया से पहली बार सीधी मुलाकात। जितना सीखते—समझते जाते शायद आकाश और बडा होता जा रहा था। यमुना दीदी जिस गहराई से बातों को समझातीं, ज्योति दी की निर्मल हंसी और बातें भी वैसी ही प्रभावकारी होतीं।

गर्मी की छुटिटयों में नाटक कार्यशालाओं का वह दौर जब हम सब होम साइंस कॉलेज को सप्ताह भर के लिए अपने घर में तब्दील कर लेते, नाटक गढते, खूब मस्ती करते, कई गांवों के बाद सेठानी घाट पर उनका प्रदर्शन। पता नहीं वह क्या असर था जो हम सभी अपने सबसे ख्यात नाटक सुदामा के चावल की प्रस्तुति मुंबई के पृथ्वी थिएटर तक में पूरी शिददत के साथ हुई। यह सब एक दौर था। इस दौर को बनाने में ज्योति दीदी ने जो समय दिया, जो संसार रचा, उसे शब्दों में बांध पाना शायद एक बहुत कठिन काम है। लेकिन हां, यह उतना ही सच है कि जो काम आज लाखों करोड़ों रूपयों की फंडिंग में भी नहीं हो पा रहा, वैसा कमाल ज्योति दीदी कुछ मुट्ठीभर रूपयों के बजट के साथ अंजाम दे पायीं। इस बात के टकराव बालसमूह में उस दौर में भी थे और आज भी कई पुराने साथियों में बहस है कि बालसमूह संभालने वाले बच्चों के लिए कुछ न्यूनतम मानदेय की व्यवस्था होनी चाहिए, लेकिन हमारा मॉडल सही में बिना किसी मानदेय के स्वैच्छिक रूप से केवल सामग्री की सहायता से बालसमूह का संचालन था। आज जब हम साथी सोचते हैं तो पाते हैं कि यह कितना बड़ा कमाल था, और वास्तव में एक सही निर्णय भी क्यों​कि बिना किसी मानदेय के काम कर पाना, कहीं ज्यादा स्थायी और वैचारिक रूप से हम सभी बालसमूह के खिलाड़ियों को मजबूती दे गया।

ज्योति दीदी के व्यक्तित्व की सबसे आकर्षक बात थी उनकी हंसी, निर्मल हंसी जो सीधे दिल से निकलती थी, उनके साथ हर मसले पर मैंने घंटों बात की। कभी मीनाक्षी चौक पर गौर साहब की दुकान पर नमकीन और चाय के साथ तो कभी नर्मदा के किनारे—किनारे। चूंकि मेरी बड़ी बहन का नाम भी ज्योति है तो मुझे एक दूसरी ज्योति दीदी बाद में मिल गयी, पर वक्त के साथ जब मैं बड़ा होता गया तो वह दीदी से दोस्त में भी तब्दील हो गयीं। वह हमारी मार्गदर्शक भी बनीं और मॉनीटर भी। वैचारिक प़क्षधरताओं, समाज के अंधविश्वासों और कुरीतियों को लेकर हमारा सही स्टैंड शायद तभी होता क्योंकि हम सोचते कि दीदी लोग क्या सोचेंगे, या हम उन्हें क्या कहेंगे। उनके माध्यम से ही हमें सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक क्ष्े. की बडी—बडी हस्तियों से मिलने का मौका मिला।

पहली बार किसी बड़ी कार्यशाला में मैंने ज्योति दीदी के साथ ही हिस्सा लिया। यह नासिक में अभ्व्यिक्ति संस्था की संप्रेषण पर एक कार्यशाला थी। देवलाली में हुई इस कार्यशाला में एकलव्य से हसन भाई, ज्योति दी और मैंने हिस्सा लिया था। उस कार्यशाला का एक एक हिस्सा मुझे अब तक याद है। वास्तव में आज जब मैं एक कैरियर के रूप में भी कम्युनिकेशन की दुनिया में हूं तो पाता हूं वह कार्यशाला एक मील का पत्थर ही तो थी।
यह सब व्यक्तिगत बातें इसलिए कि कहीं ना कहीं इन सारी प्रक्रियाओं में ज्योति दीदी एक सक्रिय भागीदार थीं। उन्हें पूरा गर्व था हम सभी बालसमूह के साथियों की तरह। भले ही आज कोई टीचर हो, कोई जर्नलिस्ट, कोई सरकारी नौकरी में है, कोई फौज में, कोई गांव में ही अपना धंधा कर रहा हो, कोई कोई भी काम नहीं कर रहा, लेकिन हां यह जरूर है कि हम सब इंसान हैं। आज भी जब हम बात करते हैं, मिलते हैं, तो तसल्ली बस यही होती है कि हां हम इंसान हैं। हमें जीना सिखाया, हमें लड़ना सिखाया है, हमें एक बेहतर दुनिया बनाने का सपना दिखाया है।
हम दूर तक जाना चाहते थे, होशंगाबाद में बंद हो चुके इस काम की टीस और पुन: शुरू करने की लगन हम सबके मन में थी है, ​ज्योति दी के साथ बाद के सालों में बैठकर हमने कई बार योजनाएं बनाईं, सोचा शुरू करते हैं, अफसोस हम नहीं कर पाए। पर हमारे सपने हमारी आंखों में जिंदा हैं। सच कहूं तो ज्योति दी के इस तरह यूं चले जाने से वह सपने तैर रहे हैं। सच मायने में तो श्रदधांजलि तभी होगी, जब हम फिर से ज्योति दीदी की दुनिया को आगे बढाएं।
मैं और बालसमूह के मेरे सभी साथियों को तुम बहुत याद आओगी ज्योति दीदी।

1 टिप्पणी:

पशुपति शर्मा ने कहा…

ज्योति दी से मेरी मुलाकात कभी हुई या नहीं... याद नहीं... लेकिन राकेश तुमने जिस तरह से उन्हें याद किया... वो जेहन में घूम रही हैं... वाकई जिंदगी में ऐसे कई लोग हैं, जो हमें गढ़ने, संवारने और इंसान बनाने में एक अहम भूमिका निभाते हैं... ऐसे लोग ता जिंदगी मन में बसे रहते हैं... न जाने कितने बच्चों ... साथियों के मन में भी ज्योति दी इसी तरह जिंदा रहेंगी.. श्रद्धांजलि...