शुक्रवार, मार्च 09, 2012

प्रेम


गिलास
लोटा 
कलछी 
गंजी 
चमकती स्याही से 
कॉपी के पिछले पन्नों पर 
शायद रात के वक़्त 
एकदम तनहाई में 
उससे बात करने के बाद 
किसी प्यारी सी कविता से 
चोरी -चोरी लिखे यह शब्द ! 

हाँ, 
तुम्हारी आँखें चमक रही हैं 
और यह मुस्कान 
जो स्वाभाविक से भी थोड़ी ज्यादा पाता हूँ मैं 
तुम जो गुनगुनाती हो 
दिल के तराने 
हाँ , हाँ 
मैं सुन रहा हूँ !

मैं देखता हूँ 
तुम्हारा 
प्रेम में कुलांचे मारना 
अक्सर  तुम्हारे 
शून्य में खो जाने का राज 
अब समझ आ रहा है 
धीरे - धीरे 
कि समझ आ रहा है की बोर्ड पर टकटकाती
 तुम्हारी उंगलियाँ 
शब्द नहीं 
लिख रहीं थीं प्रेम ! 

हाँ, मैं देख रहा हूँ 
अब से कुछ बरस पहले 
एक पुरानी से डायरी में 
 पीछे के पन्नों पर 
अब भी नख्ती है 
लोटा
बाल्टी 
कलछी 
गिलास 
वक़्त गुजर गया 
शब्द, शब्द ही रहे 
प्रेम न हो सके ! 
- राकेश मालवीय , 

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