शुक्रवार, नवंबर 12, 2010

क्या बालदिवस के हकदार हैं


राकेश मालवीय

क्या मध्यप्रदेश  बाल दिवस मनाने का हकदार है। कोई हां कहे अथवा ना। प्रदेश  के साठ प्रतिशत  बच्चे निshचित तौर पर न ही कहेंगे। क्यों न कहें। उनके बचपन से खुशियाँ दूर हैं। उनकी थालियों से रोटियां दूर हैं। उनके शरीर से पोषण गायब है। हड्डियों के ढांचे पर एक लबादा भर है। छोटी-छोटी बीमारी भी इसे बड़ी आसानी से भेदती हैं और हर दिन हम सैकड़ों शिशु  खो देते हैं। यहां भी हम देश में नंबर एक पर हैं। यह राष्ट्रीय शर्म का विषय तो है ही, लेकिन जब हम अपने प्रदेश का गौरव गान करते नहीं अघा रहे, तब एक प्रादेशिक  शर्म का विषय भी है। अब आप ही बताएं कैसे मनाएं हम बाल दिवस।

दिवस मनाने का रिवाज ठीक वैसा ही होता है जैसे कोई तीज त्योहार। इस दिन हम खुद की बेहतरी पर ख़ुशी जाहिर कर सकते हैं, लेकिन हालात ठीक न हों तो चिंतन और आगामी रणनीति तय करना बेहद जरूरी प्रक्रियाएं हो जाती हैं। बाल दिवस के संदर्भ में यह कथन बेहद उपयोगी महसूस होता है। मध्यप्रदेश के नक़्शे  पर बचपन हाशिये  पर कहा जा सकता है। केवल सरकार पर ही दोष मढ़ देने से समाज अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकता है। दरअसल तो इसमें सरकार के साथ ही समाज और परिवार को भी रखा जाना चाहिए कि आखिर हमारे प्रदेश  में बच्चों की हालत इतनी खराब क्यों है।

कुछ दिन पहले की ही बात है। शिवपुरी  के दो गांव में 17 बच्चों की मौत मीजल्स के कारण हो गई। मीजल्स का टीका सरकार भी लगाती है। पर इतनी कोशिशों  के बाद भी हर गांव और हर बच्चे तक टीकाकरण पहुंच ही नहीं पाया है। यही कारण है कि एक के बाद एक कई गांवों में तब-जब बच्चों  की मौत की खबरें सुनाई देती हैं। कई बार कुसूर सरकार का होता है और कई बार समाज का भी। यदि व्यवस्था अपनी जिम्मेदारियों से बचने या लापरवाही करने पर आमादा है तब क्या समाज समाज को इस रवैये के लिए यूं ही खामोश  बैठे रहना चाहिए। दरअसल इसी ख़ामोशी  ने आजाद भारत के साठ साल बाद और आजाद मध्यप्रदेश  के पचास साल बाद भी बच्चों की स्थिति को जस का तस ही रहने दिया है। इन अर्थों में बाल दिवस को कतई एक उत्सव के रूप में नहीं बल्कि एक सबक के रूप में मनाना ज्यादा प्रासंगिक है


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