बुधवार, सितंबर 15, 2010

विष्णु पराड़कर की दूरद्रष्टि

भविष्य में विज्ञापन एवं पूंजी का प्रभाव बढेगा. पत्र निकलकर सफलता पूर्वक चलाना बड़े- बड़े धनिकों एवं सुसंगठित कंपनियों के लिए ही संभव होगा. पत्र सर्वांग सुन्दर होंगे. आकर बड़े होंगे. छपाई अच्छी होगी. मनोहर, मनोरंजक, ज्ञानवर्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे. लेखों में विविधता होगी. कल्पकता होगी, गंभीर गंवेश्ना की झलक होगी और मनोहारिणी शक्ति भी होगी, ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जाएगी. 


यह सब होगा पर पत्र प्राणहीन हो जायेंगे, पत्रों की नीति देशभक्त, धर्मं भक्त अथवा मानवता के उपासक महाप्राण संपादकों की नीति न होगी. इन गुणों से संपन्न लेखक विकृत मष्तिस्क समझे जायेंगे. संपादक की कुर्सी तक उनकी पहुँच न होगी. 


- विष्णु पराड़कर, १९०५ 
वृन्दावन हिंदी साहित्य सम्मेलन से

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