सोमवार, सितंबर 06, 2010

मीडिया की ही नहीं है यह बहस


एक बार फिर मीडिया पर सवाल, सवाल और सवाल। संभवत: मीडिया खेती-किसानी से ज्यादा बिकाऊ विषय है। पीपली लाइव रिलीज होने की बाद की प्रतिक्रियाओं से तो हमें यही लग रहा है। पर गौर से देखें तो कृषि प्रधान कहे जाने वाले हमारे देश में आज खेती-किसानी के सवाल मीडिया के सवालों से ज्यादा मौजूं हैं। यह फिल्म उन संकटों का एक छोटा हिस्सा पेश  करती है, लेकिन मीडिया की गतिविधियों को मीडिया की ही भाषा में ज्यादा टीआरपी मिलती है। माना कि मीडिया का एक हिस्सा यकीनन फिल्म में दिखाई गई इस लाइन पर चल रहा है, लेकिन देखना यह भी होगा कि मीडिया अब आजादी के दौर के मीडिया से इतर है। अब इसमें बड़ा पूंजी निवेश  है, इसकी सत्ता भी निजी हाथों में है, बस एक जनतांत्रिक दबाव से सरोकार बाकी हैं, लेकिन समाज के दूसरे जिम्मेदार समूहों को इस बहस में क्यों नहीं शामिल किया जाना चाहिए।

दरअसल इस फिल्म पर उठे सवालों को एक अलग नजरिए के साथ देखा जाना चाहिए। क्या यह एक सुखद संकेत नहीं है कि तमाम चुनौतियों के बीच एक फिल्मकार प्रेमचंद की साहित्यिक जमीन की तरह फिल्म बनाने का साहस इस दौर में उठा पा रहा है। यह उतना ही ठोस बात है कि सिनेमा के समाज पर अपने गहरे प्रभाव हैं। आपको याद होगा गांधीगिरी को लेकर आई फिल्मों ने गांधीवाद को सालों बाद एक नए सिरे से समाज में स्थापित करने का काम बखूबी किया था। यह फिल्म का ही असर था कि लोग ट्राफिक  नियमों का पालन करने के लिए भी सड़कों पर फूल भेंट करने को उतर आए थे। जो काम तमाम आंदोलन और करोड़ों रूपए के अनुदान लेकर स्वयंसेवी संस्थाएं नहीं कर पा रही हैं वह संभावना महज एक ढाई घंटे की फिल्म पेश करती है। क्या यह बात उतनी सुखद नहीं है कि खेती-किसानी जैसे नीरस विषयों को मुख्यधारा में लाने और खेती-किसानी के संकट को एक व्यापक फलक पर रखने का काम किया गया है। दस सालों मे आठ लाख किसानों को खेती से बाहद होने का संदेष पढ़ने के साथ-साथ जब लोग हाउस फुल सिनेमा से एक्जिट गेट की तरफ बढ़ रहे होते हैं तो उनकी ख़ामोशी  साफ जाहिर करती है कि यह फिल्म केवल मनोरंजन नहीं देती। इसमें खेती-किसानी के वर्तमान हालात पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, और यह बहुत महत्वपूर्ण हैं। आज हालात यह हैं कि ग्यारह प्रतिशत  ग्रामीण आबादी के पास जमीन ही नहीं है और लगभग साठ प्रतिशत लोगों के पास साठ फीसदी एक एकड़ से कम जमीन है। दूसरी तरफ हमें यह देखना होगा कि देश में 1164 स्पेशल  इकोनॉमिक जोन मंजूर हो चुके हैं। इनमें लाखों एकड़ कृषि भूमि अब उद्योगों के पास है। अकेले महाराष्ट्र राज्य में सवा लाख एकड़ जमीन कंपनियों को दी जा चुकी है।
 
विदर्भ क्षेत्र के किसानों का विरोध झेल रही फिल्म पीपली लाइव का अंतिम दृष्य सबसे महत्वपूर्ण है। नत्था की नियति ने उसे मालिक से मजदूर बनाया। वह निराश  हैहताश  है, मजबूर है, उंची अट्टिलकाओं के बीच कतई खुश  नहीं है। एक खेतीहर किसान से मजदूर बनने की कहानी पीपली लाइव भले ही एक नाटकीय अंदाज में अपनी बात कहती है, लेकिन सच्चाई यह है कि पिछले एक दशक  में तकरीबन आठ लाख लोग खेती से बाहर हुए हैं और लगातार हो रहे हैं। यह केवल एक नत्था या पीपली गांव की ही कहानी नहीं है। विकास की अवधारणाओं पर यह एक बड़ी बहस भी है। हम जिस अमरीका की चकाचौंध के पीछे अपनी विकास गाथाएं लिखने को आतुर हैं उस देश में खेती की हालत को अब इस बात से समझा जा सकता है कि वहां खेती करने वाले केवल छह लाख किसान बचे हैं, जबकि सत्तर लाख लोग या तो जेल पर हैं या बेल पर हैं।
क्या इस पूरे दौर में हम मीडिया की बहस के साथ खेती के इन सवालों पर भी गौर करेंगे। 










2 टिप्‍पणियां:

निशांत मिश्र - Nishant Mishra ने कहा…

भाई साब! लिखते तो बढ़िया हो, कभी फोन पर भी मिल्लो!

माधव ने कहा…

agreed