शनिवार, सितंबर 04, 2010

एक शिक्षक की मौत


मित्र अजीत सिंह ठाकुर ने ऑरकुट पर यह एक पोस्ट साझा की है. शिक्षक दिवस के ठीक एक दिन पहले एक शिक्षक की मौत क्या सन्देश दे रही है...कहाँ आ पहुंचे हैं हम - राकेश 



होशंगाबाद जिले की पिपरिया तहसील के ग्राम मटकुली में एक व्यक्ति की मौत हो गई. ये कोई साधारण मौत नहीं है, ये मौत करारा तमाचा है हमारे शिक्षातंत्र पर और हमारी व्यवस्था की भयानकतम असंवेदनशीलता की नमूना. ये एक शिक्षक की मौत है.
चार महीने से वेतन नहीं मिल पाने की वजह से बीमार सहायक अध्यापक हरिकिशन ठाकुर ने बेहतर इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया.
ये उस देश में हुआ है जहाँ गुरु को गोविन्द से बड़ा बताया गया है, जहाँ एक दिन 5 सितम्बर "शिक्षक दिवस" शिक्षको को समर्पित है.
ये उस प्रदेश में हुआ जहाँ के माननीय मुख्यमंत्री जी शिक्षक दिवस पर शिक्षको के पैर धोकर उनका सम्मान करते हैं.
इस संवेदनहीन व्यवस्था में हम कैसे किसी द्रोण या चाणक्य की उम्मीद कर सकते हैं और जब द्रोण और चाणक्य नहीं होंगे तो अर्जुन और चन्द्रगुप्त की उम्मीद तो बेमानी है. 
5 सितम्बर को फिर "शिक्षक सम्मान समारोह" आयोजित किया जा रहा है, तब शायद इस शिक्षक की आत्मा पूछे "इस सम्मान की बजाय समय पर वेतन क्यों नहीं देते ?"
सच है - हमारे देश में जीवन की कीमत मौत से कम है क्योकि जहर हो गया सस्ता और महंगे हो गए गेंहू के दाने. जय हिंद. 

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