गुरुवार, जून 17, 2010

पापा तुम आ जाओ

पापा आज तो फादर्स डे है। लाखों बेटियां अपने माता-पिता की गोद में इठला रही होंगी। उनकी तमाम मांगे कम से कम आज तो पूरी की जा रही होंगी। और मैं... मैं क्या बताऊं? जब मैं ट्रेन में अकेली थी, तब से मेरा नाम और पहचान खो गई। अब मुझे मेरे नाम से कोई नहीं पुकारता। पापा, भला हो उस सफाई वाली आंटी को जिसने मुझे पुलिस अंकल तक पहुंचाया। मुझे याद है, अमरकंटक एक्सप्रेस की बोगी नंबर एस-3 का बर्थ नंबर 67, जहां मैं यह सोच रही थी कि कोई अपना आएगा और मुझे ले जाएगा। लेकिन । . .कहानी कुछ और ही बन बैठी?


उस वक्त मैं काफी डरी सहमी भी थी। पापा यह सच है न दरिन्दों और हबसियों की आंखों में उम्र, मासूमियत और अपरिपक्वता नापने का कोई पैमाना नहीं होता है। हां पापा मैंने अपनी अब तक की उम्र में ऐसा कई बार सुना है। फिर यह बताओ न कि रेलवे स्टेशन पर किस तरह के लोग नहीं होते हैं। बस उस दिन मेरी लज्जा तो बच गई, लेकिन मैं जिस प्रक्रिया से चैरिटी होम तक पहुंची उसमें भी भटकाव था। अरे पापा! मुझे भोपाल की मातृछाया, एसओएस बालग्राम और कुछ और गैस सरकारी संस्थाओं ने लेने से इनकार कर दिया। मैं विक्षिप्त और विकलांग हूं न इसलिए। अच्छा पापा सच बताओ, मुझे इसीलिए टे्रन में छोड़ा था न? 


पापा मैं भोपाल में मदर टेरेसा चैरिटी होम में हूं। मां से कहना बहुत कमजोर हो गई हूं। जब से अलग हुई, तब से कुछ खा नहीं रही हूं न। कभी-कभार दूध पी लेती हूं। लेकिन इससे सेहत नहीं बनती। सेहत के लिए तो आप लोगों का प्यार, स्पर्श भी जरूरी है न। पापा मुझे यहां आने तक कई जगह लज्जा आई। अरे हां, बच्चों के लिए काम करने का दंभ भरने वाली चाइल्ड लाइन ने भी मुझे नकार दिया। सभी ने बचकाना तर्क देकर किनारा किया है। फिर भी एक अखबार के जरिये मेरी आवाज बाल अधिकार संरक्षण आयोग तक पहुंची। पता है पापा आयोग ने संज्ञान लिया और मुझे देखने फादर्स डे के ठीक एक दिन पहले चैरिटी होम पहुंचा। मुझे बहुत खुशी हुई। 


पापा किसी को लज्जा आए न आए मैं तो लजा गई। अरे मुझे रविवार को भी बाल कल्याण समिति के सामने पेश किया जा सकता था, लेकिन चाइल्ड लाइन ने ऐसी सलाह जीआरपी वाले अंकल को नहीं दी। भला हो पुलिस अंकल का उन्होंने अस्पताल में जांच तो कराई। फिर एक बार बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष ने भी यही कहा कि कल रविवार था, समिति तो सोमवार और गुरुवार को बैठती है। कैसे पेश करते? अरे पापा उन्हें समझाना पड़ा कि यह समिति तो 24 घंटे कार्य करने के लिए बाध्य है। तब उन अंकल ने स्वीकार किया। 


पापा चाइल्ड लाइन ने कहा कि हम तीन साल से कम के बच्चों को नहीं लेते हैं। जबकि ऐसी कोई गाइड लाइन ही नहीं है। फिर मुझे क्यों छोड़ा। कारण शायद आपके छोडऩे का भी यही था कि मैं विक्षिप्त और . . . हूं। और यह भी कहा कि मातृछाया और एसओएस बालग्राम चाइल्ड लाइन से बच्चे नहीं लेते हैं। पापा यह तो सरासर झूठ था। वो तो कहीं से भी आए बच्चे लेते हैं। मैं तो इस झूठ पर लज्जा के मारे भी कुछ नहीं बोल सकी। पापा अब न वो आयोग ने संज्ञान लिया, मुझ तक चलकर आया। पापा तुम भी आ जाओ न. .. .
युवा पत्रकार अनिल चौधरी की कलम से 

1 टिप्पणी:

उन्मुक्त ने कहा…

क्या यह सच है?

कृपया वर्ड वेरीफिकेशन हटा लें। यह न केवल मेरी उम्र के लोगों को तंग करता है पर लोगों को टिप्पणी करने से भी हतोत्साहित करता है। आप चाहें तो इसकी जगह कमेंट मॉडरेशन का विकल्प ले लें।

लगता है कि आप हिन्दी फीड एग्रगेटर के साथ पंजीकृत नहीं हैं यदि यह सच है तो उनके साथ अपने चिट्ठे को अवश्य पंजीकृत करा लें। बहुत से लोग आपके लेखों का आनन्द ले पायेंगे। हिन्दी फीड एग्रगेटर की सूची यहां है।