सोमवार, जून 07, 2010

असबकदार सजा

  राकेश मालवीय
 दुनिया की सबसे भीषण त्रासदी यानी भोपाल गैस कांड में आखिरकार पच्चीस सालों की न्यायालयीन प्रक्रिया के बाद आखिरकार आरोपियों का दोष सिद्ध  हो गया। एक रात के कुछ घंटों में लगभग पच्चीस हजार मौतों और उसके बाद कई हजार लोगों को विभिन्न किस्मोंकिस्म की बीमारियों का अभिषाप देने वाली इस त्रासदी के लिए केवल दो साल की सजा मिलना निष्चित तौर पर कुछ भी नहीं है लेकिन यकीन मानिए यदि दोषियों को फांसी भी हो जाए तो क्या इस भयंकर रात को भूल पाना, जख्मों को भर पाना मुमकिन हो पाएगा। नहीं, कतई नहीं। सच्चाई तो यह है कि भोपाल गैस त्रासदी के बाद भी हमने कोई सबक नहीं लिए। हम लगभग सारे मोर्चों पर नाकाम नजर आए। सही लोगों तक, सही हाथों तक मुआवजा नहीं पहुंचा। असली हत्यारा अब भी फरार है। हजारों टन जहरीला कचरा अब भी यूका परिसर में मौजूद है। नलों से जहरीला पानी अब भी रिस रहा है। अब भी विकलांग बच्चे पैदा हो रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों तक हमारी बात मजबूती से नहीं पहुंच पाई है। और अब न्यायपालिका से आस लगाए बैठे लाखों लोगों को भी निराशा  ही हाथ लगी।
          7 जून यानी सोमवार के दिन का इस शहर को पिछले 23 सालों से इंतजार था। पिछली 13 मई को इस मामले में सुनवाई पूरी हो गई थी। इस दिन के बाद से तो लोगों की आशा और उम्मीद  और भी बढ़ गई थी। भोपाल गैस पीड़ितों के लिए काम कर रहे संगठनों ने न्याय की आस में सांकेतिक रूप से आरोपियों को शहर के चौक-चौराहों पर फांसी के फंदे पर लटका रहे थे। इसी बीच एक खबर यह भी आई कि इन पुतलों की चोरी कर ली जा रही है। गौर कीजिए जबकि एक पूरा शहर इस घटना के दुष्प्रभावों को झेल रहा है तब भी कुछ लोगों के इशारों पर इन पुतलों की चोरी की जा सकती है, तब न्याय के मंदिर की तरफ टुकटुकी लगाए लोगों की आषाएं निश्चित  ही यह फैसला सुनकर निराशा में बदली होंगी। लोगों को उम्मीद थी कि न्यायालय कम से कम इन आरोपियों को फांसी की सजा तो सुनाए ही। पर ऐसा नहीं हुआ। पंद्रह हजार लोगों की हत्या के दोषी एक छोटी सी सजा पाकर बच निकले।
 जी हां, हत्यारी फैक्ट्री में काम करने वाले केषव महिंद्रा, विजय गोखले, किषोर कामदार, जे मुकुंद, आरबी राय चौधरी, एमआर कुरैषी, केवी शेट्टी और एसपी चौधरी को सीजेएम कोर्ट ने महज दो साल की सजा और एक लाख रूपए का जुर्माना सुनाकर मामला निपटा दिया। लोगों को उम्मीद थी कि कम से कम फांसी की सजा तो जरूर होगी। इसलिए सुबह से ही कोर्ट के बाहर लोगों का हुजूम जमा होने लगा था और प्रषासन ने इससे निपटने की तैयारी के लिए एक दिन पहले ही निषेधाज्ञा लागू कर दी थी। सोमवार सुबह से ही लोगों को यहां जमा न होने की ताकीद कर दी गई थी। यहां तक कि मीडियाकर्मियों को भी खबरों के लिए खासी जद्दोजेहद करनी पड़ी।
अब जबकि यह फैसला आ ही गया है तो हमें अपनी क्षमताओं और लोगों को न्याय दिलाने की नीयत पर सोचने-समझने की जरूरत महसूस होती है। आखिर क्या कारण है कि दोष सिदृध हो जाने के बावजूद हम आरोपियों को कड़ी सजा नहीं दिलवा पाए। क्या कारण है कि वारेन एंडरसन अब तक पकड़ में नहीं आ पाया। क्या इस सजा के बाद से दूसरी फैक्ट्रियों को कोई सबक मिल पाएगा। या फिर कोई दूसरी कंपनी पच्चीस हजार लोगों की हत्या कर सिर्फ चंद नोटों का जुर्माना भर कर बच निकलेगी। 

         

2 टिप्‍पणियां:

राजेश उत्‍साही ने कहा…

बंधु मुझे एक बात समझ नहीं आई। जो धाराएं इन अपराधियों पर लगाई गईं थीं उनमें तो शायद यह पहले से ही सबको पता होगा कि अधिक से अधिक कितनी सजा और क्‍या जुर्माना होगा। फिर हम सबको इतनी हैरानी क्‍यों हो रही है। थोड़ा इस नजरिए से भी प्रकाश डालो।
दूसरी बात हमारी न्‍य‍ायिक व्‍यवस्‍था तो सालों से इस बात की गवाह है कि वहां देर ही देर है और अंधेर तो है ही। फिर भी हम उससे ही उम्‍मीद में बैठे हैं।
तीसरी बात पन्‍द्रह साल तो फैसला करने में लगा दिए। फांसी की सजा सुना भी दो तो और पंद्रह साल उनको फांसी देने में लगा देंगे। यानी वही ढाक के तीन पात ।

राकेश कुमार मालवीय ने कहा…

उत्साही जी आपकी बातें बिलकुल सही हैं. लेकिन जब जब इस तरह के मामले सामने आते हैं गुस्सा, आक्रोश स्वाभाविक है, होना भी चाहिए. हम इसी आशा में तो जीते हैं, और अपनी छोटी-छोटी कोशिशें करते हैं कि कहीं कुछ तो होगा. यदि हमारा नजरिया ढाक के तीन पात वाला है तब क्या हमें ऐसे ही बैठ जाना चाहिए. हमें पता है कि नर्मदा क़ी लड़ाई में हमें सीधे तोर पर कुछ नहीं मिला पर क्या वह लड़ाई निरर्थक है. मैं आपकी बात से बिलकुल सहमत हूँ कि न्यायपालिका से अब तक हमें नाउम्मीदी ही हासिल हुई है, पर उसके नतीजे भी हम देख रहे हैं. और मुझे लगता है कि अगले पांच सालों में आक्रोश के स्वर और तेज होंगे.
हमें लगता है कलम अपना हथियार है और ऐसे मामले जब जब आयें अभिव्यक्ति तो होनी ही चाहिए.