शनिवार, मई 29, 2010

ये हमारे मोहल्ले में रहते हैं

हमारे एक मित्र हैं। हमारे ही मोहल्ले में रहते हैं। महज पचास मीटर के फासले पर घर होने के बाद भी हम अक्सर नहीं मिल पाते। मिलते भी हैं तो उसका ठिकाना दूर कहीं होता है। उनके दफ्तर  के आसपास ही। उनकी पिछले आधे साल से एक ही शिकायत  है, और वह लगभग गरियाते हुए बोलते हैं ये दिखिये, इनसे मिलिए, ये हमारे मोहल्ले में रहते हैं।
          ऐसा नहीं है कि हम मिलना नहीं चाहते। लेकिन क्या करो। काम ही ऐसा है। चलो हम बता देते हैं। ये जो हमारे मित्र हैं वह पेशे  से पत्रकार हैं। डेस्क की जिम्मेदारी संभालते हैं। देर रात तक खबरों को छाँटते-बीनते रहते हैं, अपडेट करते रहते हैं। पेज छोड़ने के बाद बाहर सिगरेट का डिब्बा खत्म करते हैं। अकेले नहीं। रात में दो बजे कहीं और तो सिगरेट मिलती नहीं इसलिए दूसरे तलबगारों द्वारा इन्हें खोजा जाता है। और इनकी जेब में हमेशा एक भरा डिब्बा मौजूद होता है। उसके बाद यह ऑफिस से सुबह-सुबह घर आते हैं। महीने में पांच-छह रात बस स्टैंड का खाना या पोहा भी खाया जाता है। तो साहब यह है इनकी दिनचर्या। इसे रातचर्या कहें तो कैसा रहेगा। जब तक यह सोकर उठते हैं पूरा मोहल्ला अपने-अपने काम से निकल जाता है। कई बार आधा काम भी निपट जाता है। और जनाब जब लोग अपने घरों की तरफ लौटते हैं यह महाशय  फिर अगली लड़ाई लड़ने निकल जाते हैं। अब आप ही बताएं उनसे मिलें कब।
 कल रात भी जब मुलाकात के बाद यही सवाल दागा गया, और बातचीत का क्रम आगे बढा तो स्वाभाविक रूप से बात आ ही गई, क्यों पत्रकार हो क्या। असल में चर्चा हमारे एक कॉमन मित्र की शादी  मे शामिल  होने को लेकर थी। उन्होंने जब अपनी मजबूरियत जाहिर की, तब अपने मुह से भी निकल गया, क्यों पत्रकार हो क्या। खैर बात भले ही मजाक की हो, पर मामला है बहुत गंभीर। एक पत्रकार उसमें भी खासकर डेस्ककर्मी के हिस्से में न तो सुबह का लाल-लाल सूरज है और न झील के आगोश  में झिलमिलाती शाम। शादी-पार्टी में भी अंतिम मेहमान। मेजबान मजबूरियों को जानते हैं तो ठीक नहीं तो ठंडा खाना और विदा लेते मेहमान। यहां तक की अपने अजीज लोगों की शादी में भी अमूमन ऐसा ही होता है। इस पर भी खबरों का भारी दबाव। छूट जाने का भय। गलती होने की आशंका । और दूसरे दिन संपादक को जवाब देने की तैयारी, रिपोर्टर से लड़ाई की संभावना।
 पांच-छह महीने पहले तक अपनी लाइफ भी ऐसी ही थी। इधर अपने मन में कुछ और चला तो अपन ने अखबार की सक्रिय दुनिया से ब्रेक ले लिया। पर यह तो अपन पूरी शिद्दत  से मानते हैं कि अखबार की दुनिया है बहुत चैलेंजिंग।

जारी

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

shandaar
roze awwal se aawara hoon, aawara rahoonga.
chand taron me bhatakta hua shayyara rahoonga

apan to aise hi hain bhaiya