एक
रीवा-सतना वैसे तो पहले भी जाना हुआ पर इस बार मकसद जमीनी हालात देखना था। साथ में थीं श्रावणी सरकार। वह हिंदुस्तान टाइम्स भोपाल में नौकरी करती हैं। जनसरोकार के विषयों पर व्यक्तिगत रूचि है उनकी। कई शहरों में काम करने के बाद भोपाल और मप्र में लंबे समय से हैं। काम करने का नजरिया बिलकुल अलग। कहती हैं जहां मुद्दे  हो वहां काम करना चाहिए। यात्रा शुरू हुई। पहले योजना प्रशांत  भाई के जाने की थी, वह नहीं जा पाए और मेरे नाम का टिकट बना नहीं। सो उनके टिकट पर यात्रा करनी थी। यात्रा से पहले यही सोच रहे थे कि अपने आप को प्रशांत दुबे कैसे साबित करेंगे। उनका पैन कार्ड भी जेब में रख लिया था। पर्स में रखे रखे फोटो थोड़ा घिस गया था सो बात बन भी सकती थी। प्रशांत जी ने सलाह भी दी जल्दबाजी में अपना परिचय पत्र निकाल कर नहीं दे देना। नियम की कॉपी भी निकाल ली कि तत्काल टिकट पर परिचय का प्रमाण नहीं मांगा जा सकता है। खैर अदद तो टीसी महोदय आए ही नहीं। और आए तब तक श्रावणी दीदी से गप्पें लगाकर चादर तान कर लेट चुके थे। टिकट अपन ने दीदी के हवाले ही कर दिया, कहा अब आप ही देखिएगा। टीसी महोदय दीदी के अधिमान्यता प्राप्त पत्रकार परिचय पत्र देखकर आष्वस्त हो गए थे। मेरी तरफ रूबरू होने से पहले ही उन्होंने कह दिया उन्हें सोने दीजिए वह तो मेरे साथ ही हैं। बला टली। राकेश  मालवीय प्रशांत दुबे की सीट पर अब राकेश मालवीय बनकर सो चुके थे। मुजीब भाई यानी हिंदुस्तान टाइम्स के फोटोजर्नलिस्ट अंतिम कुछ घंटों में कार्र्यक्रम बना सके। या कहें छुट्टी मिल सकी। वह एक अलग कोच में सफर कर रहे थे।


दो

हम सतना से जाने को तैयार थे। सोचा पहले कुछ खा लिया जाए। फील्ड मे क्या मिलेगा कुछ तय नहीं। इंडियन काफी हाउस के रेस्तरां में कटलेट, मसाला डोसा और लस्सी का स्वाद चखा। यहां से हमें जाना था मझगवां ब्लॉक। मझगवां ब्लॉक सतना से कोई पचास किमी दूर है। मझगवां में हम पहले आदिवासी अधिकार मंच आम के साथी आनंद और प्रतीक भाई से मिले। इन छोटी-छोटी जगहों पर अत्यंत कम संसाधनों में ऐसे लोग मुद्दों की अलख जगाए हैं। दो छोटी-छोटी टेबल, कुछ फाइल, किताबें एक स्टील की बालटी में भरा कुनकुना पानी। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण चीज थी आत्मीयता। आनंद भाई, प्रतीक भाई से जाने तकरीबन आधे घंटे तक दूरदराज के गांवों में कई अलग-अलग मुद्दों पर विस्तार से बात हुई। उन्होंने सूचना के अधिकार के माध्यम से निकाले गए कई दस्तावेज भी सामने रखे।


यह क्षेत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि यहां तकरीबन एक साल पहले एनसीपीसीआर, राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष शांता सिन्हा ने दौरा कर व्यवस्था में सुधार के निर्देष दिए थे। इसके लिए बकायदा एक पत्र भी जारी किया गया था। दीदी एनसीपीसीआर के उस पत्र, दौरे और उसके बाद एक साल की गतिविधियों के बाद के हालात को टटोलने की योजना पहले ही बना चुकी थीं। प्रतीक भाई ने बताया कि अक्टूबर से लेकर नवम्बर 2009 तक यहां के छह गांवों में 19 बच्चों की और मौत हो चुकी थीं। यह बड़ा आंकड़ा था। खासकर उस आंकड़े के बाद जबकि अक्टूबर से लेकर जनवरी 09 तक में मझगंवा ब्लॉक के इन्हीं गांवों में 30 बच्चे मरे थे, और इसी आधार पर एनसीपीसीआर ने यहां दौरा भी किया था। उन्होंने बताया कि इसके बाद रामनगर पुखलाव में तीन, सुआ पहाड़ी में दो, उत्तरी सुआ में दो, पुतरिहा में दो, डाटन में दो और मडलिहाई में आठ बच्चों की मौत दर्ज हुई थीं। इन गांवों में ज्यादातर मवासी और कोल आदिवासियों के घर हैं। इन गांवों में सरकार ने पांच हजार रूपए अलग से दिए थे। उन्होंने दिलचस्प तथ्य यह भी बताया कि सरकार के ही दस्तावेज के अनुसार एक गांव में चार बच्चों के दूध पर बत्तीस सौ रूपए खर्च किए गए, लेकिन उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। अपने जमीनी अनुभवों के आधार पर आनंद और प्रतीक का कहना था कि इन बुरे हालात के पीछे सबसे बड़ा कारण खाद्यान्न असुरक्षा है। क्षेत्र में पलायन बड़ा मुद्दा है और लोग यूपी, सूरज, गुजरात, मुम्बई  तक काम की तलाश में जाते हैं। रोजगार गारंटी योजना में जॉब कार्ड तो मिलता है, लेकिन जॉब नहीं मिलता। जॉब मिल भी जाए तो मजदूरी नहीं मिलती। सबसे बड़ी गड़बड़ मूल्यांकन पदधति की है। कई जगह इतनी कठोर हैं कि दिन भर मजदूरी करने के बाद भी मजदूरी दस रूपए ही बन पाती है। कई जगह जॉब कार्ड के नाम पर कवर पेज ही पकड़ा दिया गया है। प्रतीक का कहना कि यहां रोजगार गारंटी योजना से लोगों का मोह भंग हो गया है और सरकार के पास ग्यारह सौ करोड़ रूपए का डेटा ही नहीं है। दिलचस्प यह है कि सतना जिले को इस योजना के बेहतर क्रियान्वयन के लिए देश  की राजधानी में अवार्ड मिला है। बातचीत बढ़ती ही जा रही थी। हमने कहा फील्ड के लिए निकलते हैं, रास्ते में बातचीत होती रहेगी।

तीन : किराईपोखरी

किराईपोखरी मझगवां से कोई बीस किमी का गांव। सिंहपुर पंचायत में बसा एक टोला। गर्मी में सरसों की फसल कट जाने के बाद गांव तक जाने का रास्ता बन चुका था। वरना पैदल ही जाना पड़ता। दोनों टोले में कुल मिलाकर 41 घर। इस गांव में कमलेष नाम का एक बच्चा खत्म हुआ। स्थानीय रहवासियों ने बताया कि बच्चा काफी दुबला-पतला था, बस शाम को बीमार हुआ और रात ग्यारह बजे खत्म हो गया। कमलेष का नाम आंगनबाड़ी में भी दर्ज था, लेकिन आंगनबाड़ी की सेवाएं और सुविधाएं इस गांव को नसीब नहीं होतीं। गांव वालों ने बताया कि आंगनबाड़ी केन्द्र यहां से तीन किमी दूर है। गांव में तकरीबन 40 से 45 बच्चे हैं, लेकिन इसके बावजूद यहां कोई स्वतंत्र  आंगनवाड़ी केन्द्र नहीं है। टंकी के पास  कभी-कभी मैडम आ जाती हैं और टीकाकरण हो जाता है। राशन की भी यही हालत है। चार किमी दूर सिंहपुर गांव में दुकान है। यहां से बीस किलो अनाज और पांच लीटर कैरोसिन मिलता है। शक्कर साल में एक बार केवल होली के समय मिली, वह भी एक किलो। गांव का एक आदिवासी युवक तो मजदूरी करने हैदराबाद गया था। वह अब गायब है। कोई पता नहीं। स्थानीय युवक कमलेश  पिता बुधलाल ने बताया कि अब तो बाहर जाने में डर लगता है। रहवासियों ने बताया कि अरहर की दाल तो उन्होंने पिछले एक साल से नहीं खाई । उन्हें ख़ुशी   थी कि इस साल उन्होंने अरहर बोई और थोड़ी-बहुत हुई भी है, इसलिए इस साल वे दाल खाएंगे। इसके अलावा गर्मियों में आलू और चना की भाजी ही उनका सहारा है। चना की भाजी बनाने का तरीका भी दिलचस्प है। चना की हरी फसल में से पत्तियों को तोड़कर सुखा लिया जाता है। यह गर्मी के मौसम मे इनका सहारा बनती है। मुझे याद आ रहा था कि हमारी दादी भी सालों पहले ऐसा ही करती थीं, लेकिन वर्षों हो गए उस भाजी का स्वाद चखे हुए। यह बात अलग थी कि हमारे यहां यह एक शौकिया विकल्प था पर इस समाज की मजबूरी। बारिष में जरूर अंगीठा, दुबारी और अन्य भाजी, सब्जी खाने को मिल जाती है। जिस जगह यह बातचीत चल रही थी उसके आसपास हमें बच्चे सूखी रोटी हाथ में लेकर खाते नजर आ रहे थे। गांव में दूध की उपलब्धता के सवाल पर जौहरी लाल का का कहना था कि एक बार बीमार पड़े तो डॉक्टर ने दूध के साथ गोली खाने को कहा। पूरे गांव में दूध खोजा मगर एक कप दूध भी नहीं मिला। अप्रैल आते-आते पेड़ों से महुए पक-पककर टपकने लगते हैं, इन दिनों गांव में सुबह और शाम के वक्त लोग महुआ बीनने जाते हैं। जौहरी लाल की पत्नी ने बताया कि इन दिनों वह महुआ और चना मिलाकर डुबरी बनाते हैं। उन्होंने एक पन्नी में हमारे लिए भी महुआ बांध दिया।



स्थानीय निवासी जौहरी लाल ने बताया कि 2006 में उन्हें चार महीने में केवल दस दिन सरकारी काम मिला। सरकारी से उनका आशय  रोजगार गारंटी योजना के काम से था। उस काम की मजदूरी उन्हें आज तक नहीं मिली है।  इसलिए वह दूसरी मजदूरी करने जाते हैं। उनके धरों के आसपास खेत लगे हुए हैं। पर वह उनके नहीं है। जब हमने उनके जॉबकार्ड देखे तो वह खाली थे और कई जगह जॉबकार्ड के झेरॉक्स कॉपी ही रखे थे। किरहाई टोले के दूसरे गांव में हमें राशन  कार्ड का भी एक अद्भुत नमूना देखने को मिला। इस गांव के नारायण मवासी के पास राषन कार्ड के नाम पर कागज का एक पुर्जा मात्र था। इसी पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत उन्हें राशन उपलब्ध हो रहा था।


 इन लोगों से आपबीती जानने के बाद हम अगले गांव की तरफ निकल चुके थे। आनंद भाई की नजर गाड़ी के मीटर पर लगी थी और वह जानना चाह रहे थे कि असल में आंगनवाड़ी की दूरी क्या है। क्योंकि गांव के लोग छोटे रास्ते से वहां तक जाते थे, सो वह उन्हें कम लगती थी। पता चला कि सही रास्ते से जाएं तो यह दूरी छह किमी है। समझा जा सकता है कि इतनी दूर तक आंगनवाड़ी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली का राशन कैसे आता होगा।
तीन: मडुलिहाई




अगला पड़ाव था मडुलिहाई गांव। इस गांव में तकरीबन दौ सौ घर हैं।  गांव में प्रवेष करते ही हमारी नजर आंगनवाड़ी केन्द्र पर पड़ी। यह एक पुराना भवन था। सारे दरवाजे खिड़की गायब। कई जगह से छत भी खुली हुई। यहां एक संदेष भी लिखा था पानी नहीं होने के कारण केन्द्र 15 अप्रैल से 30 जून तक घर में संचालित है। इस गांव में भी पिछले माहों में कुछ बच्चों की मौत दर्ज की गई थी। स्थानीय निवासी गुलाब ने बताया कि उनका लड़का नयेलाल दो माह पहले ही अचानक मर गया। देखने में वह कमजोर था और खाना भी नहीं खाता था। उसके इलाज पर भी उन्होंने कोई सात हजार रूपए खर्च कर दिए। इसी तरह उर्मिला पिता तेजबहादुर की मौत भी तेज बुखार आने के बाद हो  गई। उसका नाम आंगनवाड़ी केन्द्र में दर्ज था। और वह तीसरे ग्रेड के कुपोषण में आती थी। सोती पिता चमलिया नाम की डेढ़ वर्षीय बच्ची की मौत भी लोगों ने सूखा रोग के कारण बताई। यहां कुपोषण को वह सूखा रोग कहते हैं। इस गांव में भी आंगनवाड़ी केन्द्र, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति अन्य दूरदराज के गांवों की तरह ही दयनीय नजर आई। इस गांव में हमने आंगनवाड़ी कार्यकर्ता से मिलना चाहा। दो बार उनके घर तक गए। पर वह गांव में ही कहीं गईं थीं। सन्देश  भिजवाने पर भी नहीं आईं।



चार: सुआपहाड़ी

हम वापस मझगंवा की तरफ लौट रहे थे। रास्ते में एक गांव और देखना था। सुआपहाड़ी। नजदीक ही एक पहाड़ी होने से यह नाम पड़ा होगा। यह टोला पिंजरा पंचायत के अंतर्गत आता है। यहां पर कोल आदिवासियों की संख्या अधिक है। इन आदिवासियों के घर कहीं अधिक व्यवस्थित नजर आते हैं। हम घर में सामने की तरफ दो मंजिले होती हैं। इस टोले में लगभग पचास घर हैं। रहवासियों ने बताया कि यहां लीला पिता गोपाल डेढ़ वर्षशिवानी  पिता गोरेलाल एक वर्ष और एक षिषु की मौत प्रसव के आधे घंटे बाद ही हुई है। प्रतीक भाई के दस्तावेजों के मुताबिक इस गांव में भी बच्चों के स्वास्थ्य के लिए पांच हजार रूपए की राषि अलग से आई थी। इसमें से चार हजार पांच सौ रूपए केवल बच्चों के दूध पर खर्च किए गए। इसके बाद भी शिशुओं  के स्वास्थ्य में कोई खास सुधार नहीं हुआ। कागजों में जरूर बच्चों का वजन लगातार बढ़ना बताया गया लेकिन रहवासियों ने बताया कि यहां लंबे समय से बच्चों का वजन ही नहीं किया गया है। इस गांव में भी लगभग चालीस से ज्यादा बच्चे हैं, लेकिन कोई आंगनवाड़ी सेंटर नहीं खुल पाया है। 


दूसरे दिन हम रीवा जिले के कोनी करौली गांव में थे। यहां की दषा भी बेहद खराब थी। क्रमश: